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जब हम होते हैं खुद से निराश और बोझिल , जब कोई नही दिखता है आस-पास , जब खो जाता हैं आत्मविश्वास , जब उठने लगता है ईश्वर पर से भी विश्वास ... तभी अचानक एक दोस्त आता हैं ज़िन्दगी में . कही से -- शायद सात समुन्दर पार से , शायद कही आस-पास से , बनके शम्भू , बनके तारणहार , और दिलाता है विश्वास -- जब कोई न हो तुम्हारे साथ... तुम्हारे साथ -"मै हूँ न " (मित्र को सादर समर्पित) |
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शायद यह भी दोस्त का एक रूप होता है , जब चाहते है उसे अपने नजदीक , तभी वह दूर होता है ! कभी बहाना समय का , कभी बहाना विचारो का , तो कभी बीमारी का , खुद में उलझना रिश्तो को बचाते हुए ! जब जरुरत हो छाँव की तभी वह धूप होता है ! फिर भी वह हमें अज़ीज़ है बहुत ! क्युकी वह हमारा ही प्रतिरूप होता हैं !! ( अपने एक अज़ीज़ मित्र को समर्पित ) |
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किसे कहूँ दोस्त ? तुम्हे , उनको या खुद को . उलझन ही रही सब कुछ , शायद जिन्दगी .शायद तुम .शायद मै ..... किसे समझू -- तुम्हे या खुद को ? किसे पढू -- तुम्हे या खुद को ? शायद नादान हूँ मै.... रहने दो न नादान मुझे क्या होगा पहचान कर हर चेहरों को ? हर चेहरे में आईना ही तो दिखता है ... जाना-पहचाना सा. क्या कोई रिश्ता फांसी के फंदे से कम होता है ? दम घुटते हुए रोज़ मरते है हम इन्ही रिश्तो में . फिर भी रिश्तो को हलकी सी ठेस में तोड़ कर , आगे बढ़ जाते है नए रिश्तो की तलाश में ... जाने दो , मत बताओ मुझे --रिश्तो का दर्शन .... बहुत चुभे है ये टूटे हुए कांच के किरचो की तरह ........ नही नही अब नही , कुछ नही ! बस यूँ हीं ! कविता एवं फोटोग्राफी --मीतू . दिनांक ०४१०२०१० रात्रि ११:२५ . |
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मैं अब भी इसी आशा में हूँ, कि तुम कुछ तो कहोगे! बात आधे रास्ते में छोड़कर, तुम चुप तो नहीं रहोगे ! मुझे तो अभी बहुत कुछ जानना है, आकाश का विस्तार नापना है! सागर की गहराई थाहनी है, और मरने से पहले खुद को भी पहचानना है! जीवन के थपेड़े तो बहुत खाए, मगर मंसूबे अभी भी मरे नहीं है! पेड़ के सभी पत्ते गरचे हरे नहीं हैं, मगर डाली में रस है! और रस की यह धारा है, जो कैद से छूटना चाहती है! टहनी के भीतर भी अजब सी बेचैनी है, शायद कोई कोँपल फूटना चाहती है! कविता एवं फोटोग्राफी ... मीतू ! |
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तुमको छूने की ख्वाहिश थी , मगर तुम दूर थे आफताब की तरह ! ये देख लो मेरे हौसलों की उड़ान , पकड़ किया अपने हाथो में गुलो की तरह !! कविता २६ ०९ २०१० अपरान्ह ३:०० |
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मन है की बस पांखी की तरह , उड़ता ही जा रहा है अतीत की गलियों में , कभी सुनहरे बादलो के बीच तो कभी तितलियों के देश .... मन के सिन्धु है की छलकने को तैयार , नैनों के तटबंध तोड़ विद्रोह करने को आतुर , क्या कहू , कैसे .. किससे ? अब तो कुछ भी पता नही , अपना भी नही .... थक चुके है पर , ढूंढ़ रहे है छाँव भरे मुंडेर ..... नही कोई आसरा , है हर तरफ कड़ी धूप , माँ के आँचल की छाँव , पिता के बाहों का सहारा , ओंझल हुआ सब महत्वकांक्षाओ के आकाश में !! नही-नही , अब कुछ भी तो नही ! मै भी नही , कुछ नही अब कोई नही ....! बस यूँ ही .... |
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अर्थ है क्या- प्रेम का , आकांक्षा का ...तुम बताओ ! क्या इसे हम प्राप्त करते है निरर्थक आस्था में , या की सरिता के निराले बांकपन में ? --तुम बताओ ! शांत लहरों की अज़ब उत्तेजना का सबब क्या है ? सिन्धु जल के ज्वार में क्या राज़ है ? --मुझको बताओ ! रूठ जायेंगे , न मानेंगे युगों तक ! तुम कहाँ हो , कौन हो ? कुछ तो बताओ ....!!!!!!!! |
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. विभावरी की द्वितीय बेला में , मेरे मित्र से मेरा साक्षात्कार हुआ ! कहने लगा सो जाओ तुम , मत उलझो इन जंजालों में ..... क्या पाओगी तुम , क्या तुमने खोया है ? कैसे सुनेगा कोई बात तुम्हारी , जब सारा जग सोया है !! जानता हूँ तुम हो अकेली , इस जीवन के कुरुक्षेत्र में ! पर कैसे दू साथ तुम्हारा , लगा दे न कोई कलंक हममे !! सीख सको तो सीख लो इतिहास , जब अभिमन्यु हारा था ! चुन-चुन कर अपनों ने ही , उसे रण-भूमि में मारा था !! विचार संकीर्ण , कुंठित मानसिकता , आज फिर अभिमन्यु अकेला है ! मत सोचो , अब सो जाओ सखी.. यह रात्रि की चतुर्थ बेला है...... (यह कविता मेरे मित्र से मेरी बातचीत का सारांश है, इसमें कुछ लाइन बिना बदलाव के है ..) |
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आज फिर झंझा घिरी और मन के सिन्धु छलके !
ये कौन आया याद कि ये नयनो के तटबंध छलके !!
दूर तक घन तिमिर के श्याम अंचल में ,
एक आभा बिम्ब की सी आती हलचल में ,
और मेरी रागिनी व्यग्र होती ,
उसे पाने उर्मि झिलमिल में ....
बिम्ब वो क्यू पास आते , मेहमां थे चंद पल के !
ये कौन आया याद कि ये नयनो के तटबंध छलके !!
----मीतू ०६०९२०१० सायं ८:०३ Copyright ©
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तुम मेरे ज़ेहन में तस्वीर की तरह मत आओ , दिल की गहराइयो में उतरता जाता है एक - एक लम्हा !! तमन्नाये बनकर , उमड़ रहा है आँसूवो का तूफान ! कही दूर से आती है आवाज़ , यादो के साये उभरते है ज़ेहन में आहिस्ता - आहिस्ता!! मचल उठती है तबियत उन सायो को पकड़ने के लिए , लेकिन वक्त मुझे आज से जोड़े रखता है , नयी दुनिया बसाने के लिए !! |
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माँ का होना.....
जिसका ममता भरा हृदय,
जान लेता है वो सब कुछ ...
जो रह जाता है अक्सर अनकहा....
dis iz nt written by me
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जो मेरे कदमो तले न आये,
वो ख्वाहिश क्या जो इतिहास न बन जाये,
कदम-दर-कदम ज़मीं को नापते रहे हम,
चट्टानों पर चढ़ते चले गये ऊंचाइयों तक पहुँचने कि चाह में,
कुछ ख्वाहिशे, कुछ हौसले, कुछ राहे, साथ थी,
मंजिल थी आँसमां पे,
फिर भी पास थी !!
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जब मेरे नंगे पाँव, आग का दरिया पार करते रहे - मेरे सामने एक नया अध्याय खुला, मैं, न तो कांच की गुडिया हूँ , न मोम की मूरत ..... मैं अमरबेल हूँ ! फुनगी-फुनगी लहरा सकती हूँ, ज़ख्म-ज़ख्म एहसासों के बाबजूद, मुस्करा सकती हूँ, मौत को भी जिन्दगी का, सबक पढ़ा सकती हूँ ! |
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परिंदा, पिंजरे के अन्दर, चारो तरफ गोल-गोल चक्कर लगाया, उड़ने के लिए पंख फडफडाये- अफ़सोस उड़ न सका..... मै साक्षी थी उसकी बेबसी, लाचारी, क्रोध और झल्लाहट की, समय के साथ वह भूलता गया पंख फडफडाना, समझौता कर लिया था उसने परिस्तिथियों से- भूल गया .. वह परिंदा है उन्मुक्त गगन का .. हम दोनों में एक ही समता थी ... परिस्तिथियों से सझौता कर लेने की... और अपने सामर्थ्य को भूल जाने की........!! |
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माँ ने सिखाया था बचपन में बेटी जोर से मत हँसना,धीरे ,धीरे बोलना पूछती थी की - क्यूँ माँ ? कहती थी, हँसना जब तू अपने घर जाएगी , बोलना उससे जिसके संग ब्याहेगी.... मै समझ गयी ,कुछ कहा नहीं .... आँखों में सपने संजो कर चल दी अपने ससुराल सोंचा की ,अब खिलखिलायुंगी - मगर यह क्या ? यहाँ भी शब्द गूंजते हैं ! और सब कहते हैं ! तू तो परायी है ,अपने घर से क्या लायी है ! माँ ,- बतावो न माँ मेरा घर कहाँ है ? |
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सड़क किनारे , खुले आकाश के नीचे , सिसकता है एक नागफनी . रोज़ मातम मनाता है , सिर उठाकर पूंछता है आकाश से , मैंने कौन सा पाप किया है ? जिससे मुझे निकल दिया है , फूलों के बाग़ से , क्या मैं कुरूप हूँ ? या मेरे कांटे चुभते हैं सबके दिल में ? अगर " कांटे " मेरे निर्वासन का कारण हैं , तो निकल दो "गुलाब " को भी , फूलों के बाग़ से |
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क्यों होता है जरुरी, रिश्तो को कोई नाम देना ,, बेनाम रिश्तो की भी अहमियत है...! क्योकि ! गहराई में डूबे हुए, सम्पूर्ण खुबसूरत रिश्ते,, अक्सर बेनाम ही होते है...!! |
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गैर को दर्द बताने की, ज़रूरत क्या है ? अपने झगडे में ज़माने की, ज़रूरत क्या है? ज़िन्दगी वैसे भी कम है, जीने के लिए ! रूठकर वक़्त गँवाने की, ज़रूरत क्या है ?? |
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तुम चले गए तब याद आया.... कुछ बातें अभी अधूरी थी , कुछ यादें अभी अधूरी थी , कुछ वादे थे जो झूठे थे , वो जीवन पथ भी सूना था , ह्र्दयांगन भी कुछ रीता था ..! कुछ यादें जो तुम छोड़ चले , कुछ वादे जो तुम भूल गए , हम ठगे ठगे बस खड़े रहे , क्या कुछ खोया, क्या कुछ पाया , तुम चले गए तब याद आया. मीतू..... Copyright © |
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हे प्रभु ! कंहा हो तुम ? कहते हैं सब, तुम हमारे भीतर हो तो बतावो .... पुरुष को कठोर अहंकारी बनाने का अधिकार दिया किसने तुम्हे ? क्यों बनाया स्त्री को तुमने कोमल ,निर्मल समर्पिता,? कहते सुना है स्त्री छलनामयी होती है , कैसे ? छलता तो उसे पुरुष हीं है , पिता, पति , पुत्र और प्रेमी बनकर,.... क्या तुमने नहीं छला स्त्री को ? कोमलांगी , समर्पिता बना कर ..... हे इश्वर मुझसे मिलो तो पूछूं तुमसे ... पुरुष को क्यों नहीं दिए ये गुण ? प्रेम और समर्पण के ....... |
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तुम्हे, मेरा दुसरे मर्दों के साथ,
हँसना और बोलना पसंद नहीं है,- ये समझकर कि मैं तुम्हारी गैर मौजूदगी में, आवारा घूमती-फिरती हूँ, तुम अंदर ही अंदर सुलगते रहते हो...... तुम अपने आपको यंत्रणा देते हो, ये सोचकर- कि मैं तुम्हारे जानने वालो, और अपने जानने वालो, और दुसरे तमाम लोगो के साथ, तुम्हारे खिलाफ बाते किया करती हूँ..... तुम्हे इस वहम ने पागल कर रखा है- कि मैं दूसरे मर्दों के साथ कामुक खेल खेलती होऊंगी , महज़ इस ख़याल से - कि घर वापस आकर तुम्हें न जाने, किस तरह का मंज़र देखना पड़े , तुम्हारे होश गुम हो जाते हैं ....... मेरे साथ रहते हुए, तुम्हारी जिंदगी हजारो - आशंकाओ में घिरी हुयी हैं, लेकिन, तुम इतने बुजदिल हो, कि मेरे बगैर जिंदा भी नहीं रह सकते, और तुममे इतनी योग्यता भी नही हैं - कि शादी-शुदा जिन्दगी के योग्य हो सको!!!!!! मीतू........... Copyright © ( नोट .... .यह कविता मेरी एक मित्र के जीवन से ताल्लुक रखती है , जीवन संघर्ष के दौरान ही वे परिणय सूत्र में बंधे .... विवाह के ३ वर्ष के अन्दर ही अनामिका घर का सारा कार्य करते हुए कड़े संघर्ष के बदौलत नायब तहसीलदार हो गयी किन्तु उसका पति निकम्मा ही रहा ... कई बार उसे व्यवसाय करने के लिए भी पैसा दिया गया ...किन्तु पत्नी की कमाई पर कई व्यवसनो के आदि हो चुके निकम्मे पति को काम करना रास नही आता था ... वह पैसे लेने के लिए आनामिका को उसके कार्य स्थल पर जाकर प्रताड़ित करता था .... बेबुनियाद शक करता था ..और तरह-तरह से मानसिक/शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता था .... यहाँ तक की मेरी उस मित्र के लाख चाहने के बावजूद भी उसने उसको मातृत्व के अधिकार से वंचित रखा था ..तंग आकर मेरी उस मित्र ने आत्महत्या कर ली .! आज वह पुरुष दो बच्चो का पिता है , पत्नी दूकान चलाती है !!! ) ( यह कविता उन शादी-शुदा स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है , जिनके पति हीन भावना के चलते अपनी पत्नियों पर बेबुनियाद शक करते है ) |
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तुम आओं एक बार ! मेरे हृदय का गीला आँगन , आतुर है चिन्हित करने को तुम्हारा आगमन... अनवरत प्रतीक्षा , कब तक....? एक हठीला विश्वास तुम्हारे आने का , बेबस अकुलाहट में चू पड़ते हैं आँख से आँसू ......... तुमसे इतना प्यार क्यों.....? तुम आओं एक बार ! आतुर हैं मेरी भावनाओं के बादल .. बरसने को तुम पर, समर्पित मैं तुमको साधिकार ! हर आहट पर तुम्हारे आने का भ्रम, खुली खिड़की दो आँखें , बस शेष इतना ही ................. ................................. ............................................... !!!! |
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मेरे ख्वाबों की ज़मीं पर , फूटते हैं अंकुर, नन्ही-नन्ही ,आशाओं के... जाने कब यह पौधा बनेगा .. और, होगा यह पुष्पित-पल्लवित , कभी तो मेरे ख्वाब-सच होंगे !! |
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व्यथित मन के उद्गार प्रश्न जगाते हैं ,
अन्दर ही अन्दर सुसुप्त चेतना को पंख लगाते हैं .... मन से उड़ गए सारे भाव विचार , देखी जब भी सुन्दर सी नार- कचनार , पतझड़ के मौसम में भी श्रृंगार होता है , हर कन्या को देखते ही दीवाना दिल बार - बार होता है ! ह्रदय में मचती है कुलबुली, जब घर में आती है कोई चुलबुली , तन में उठती है मीठी सिरहन, हों जाता है धन्य तदन ! अरमान भरे दिल को बड़ा दुखाती है , जब कन्या कोई अंकल कहकर मुझे बुलाती है , मन बड़ा तनावग्रस्त हों जाता है , भाव सारा अभावग्रस्त हों जाता है ! फिर भी कोई बात नहीं...... अपनी उच्छृँखलता को अपने गाम्भीर्य के भाव मे बांधकर , बेटी कहकर गले लगाता हूँ, पीठ पर हाथ फेर कर स्वर्ग सुख का आनंद उठाता हूँ ! मैं पुरुष हूँ , पंछी उमुक्त गगन का , जिंदगी भर से यही करता आया हूँ , अब अधेड़ हों गया तो क्या ? क्यों रखूं अपनी आकांक्षाओं पर नियंत्रण ? क्यों मानू खुद को शादी शुदा ? है नहीं मुझ पर कहीं कोई ठप्पा ? बालो मे कालिख , चेहरे पर खड़िया । मुँह में 32 की जगह 26 दांत हैं , उम्र भले ही 55 साल है , मगर दिल तो उमंगो से मालामाल है !! |
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हवाओं में ये कैसी सिहरन,
धरती से उठी कैसी भीनी सुगंध ! फिज़ाओं में ये कैसा जादू , मन में उमड़ने लगे है ज़ज्बात ! शुष्क धरती के होठों की प्यास बुझाती, मौषम की ये पहली बरसात !......... पहली बारिश के मधुर नाद में, आर्द्र हों उठा है मन ! हृदय वीणा के मौनबद्ध तार को , झनझना देते हैं बार - बार ! हवाएं सरगोशी से कुछ कहने सी लगी है , ये कैसा नशा है.... कैसा है ये जादू !..... क्यों धड़कता दिल, हो रहा है बेकाबू ! सांसे थाम कर बैठे हैं हम , ये दिल थामकर बैठे हैं हम! अब तो कह दो, ..कह दो ... क्यों हों तुम ऐसे, कि तुम्हे सजदा करने को बैठे है हम ...!! |
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इबारत जाग जाती है ,किसी भूली कहानी की !
न देखो इस तरह से ,कांपती है सतह पानी की !! ज़हन में कौंधती हैं सुबहें , कई धोखे बताती हैं , कि बेबुनियाद बातें ,रात भर हमको सताती है ! हमें पहचान लेती है ,ढीठ खुशबु रात रानी की !! शज़र बूढी दवायों के ,किसे कब शाप देते हैं , हम अपना कद पहाड़ों पर,खड़े होकर ही नाप लेते हैं ! कहीं अलफ़ाज़, शीशा, ऋतु कहीं सदा बयानी की !! उछलते तेज झरनों में,कई खरगोश दिखते हैं , घनी परछाईयों में ,हम तुम्ही को धूप लिखते हैं.! बिखरती है कहाँ तस्वीर , बचपन की , जवानी की !! |
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