तुम चले गए तब याद आया....
 

कुछ बातें अभी अधूरी थी ,
कुछ यादें अभी अधूरी थी ,
कुछ वादे थे जो झूठे थे ,
वो जीवन पथ भी सूना था ,
ह्र्दयांगन भी कुछ रीता था ..!
 

कुछ यादें जो तुम छोड़ चले ,
कुछ वादे जो तुम भूल गए ,
हम ठगे ठगे बस खड़े रहे ,
क्या कुछ खोया, क्या कुछ पाया ,
तुम चले गए तब याद आया.

मीतू.....  Copyright ©


4 Responses to "यादें !"

  1. Saurabh Says:

    फूल यहीं-यहीं रहे बहार ले गये हैं वो..

    दिल था कुछ खुला-खुला
    असर भी कुछ मिलाजुला
    बहार के फुहार की खुमार ले गये हैं वो..

    मीतूजी, पंक्तियों में भाव हैं, कसावट और हो तो भाव-शब्द बोलेंगे.
    अच्छा लिखा है. धन्यवाद.

  2. Yaayaavar Says:

    Kya khoya kya paya
    Kuchh yaad raha kuchh bhool gaye
    jo yaad raha vo paas raha
    jo khoya vo bhool gaye

    Mutthi ki ret ki tarah
    kshan kan, kshan bhar ki
    liye sukhad anubhuti
    muthhi se fisal gaye

    Ab un palon ko yaad karte hain
    swayam ko traas dete hain
    shesh pal shesh rahe
    jeevan k swarnim pal
    pal bhar me nikal gaye

    Ab baant johte hain unki
    jinko yahan na aana hai
    jeevit jinse yeh jeevan tha
    jeevan e aise roothe
    jeevan se nikal gaye

    Hai trasadi kya karun mai
    kuchh bhi na apne haath laga
    haath badha kar tode jo fal
    daali ki aisi haai lagi
    daman me sanchit sare fal
    daaman se fisal gaye

    Jaane bhi do vo pal
    pal bhar ka abhaas sahi
    ab bhi un pal ki yadon me aise doobe
    baton ho baton me door talak nikal gaye

    Hai sannate ka rahasya
    jeevan ka yeh sannata hai
    din bhar ki kolahal khatm hui
    raat bhi ab dastak dene lagi
    subah se chak rahe the jo pakshi
    apne gharon ko nikal gaye

    ek guthali, ek aas ko moti
    jeevan ko the samet rahe
    tez dhoop ki aanv lagi
    dono jhulse usme aise
    ki mati me bhikar gaye.

    Ye to mere shabd the, lekin aap jeewan ko mujhe behtar padhti hain.
    Manish Yaayaavar

  3. meena Says:

    HELLO MEETU JI,
    aap ki kavitae bahut hi khubsurat hai
    maine kaj pahli baar aapki kavitae padi hai bahut accaha laga, aap isi tarah kavitae likhte rahe yahi aasha hai. aap ki kavitae padhkar dil me shanti or umang bhar jati hai

    thanks & have a nice day....forever.

  4. amit Says:

    very nice attract me my heart so beautiful

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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