मुझे प्यार था एक पुष्प  से ,
इतना प्यार की ,
मुझे डर होने लगा कि-
कहीं प्रजिन के तेज़ झोंको से बिखर न जाए उसकी मासूम पंखुड़ियाँ ...
कहीं धुप की प्रखर किरणे झुलसा न दे उसको ..
कहीं कोई पडोसी तोड़  न ले जाए उसको चुपके से ....!
यह सब ख्याल करके ,
की अब रहे सुरक्षित वह...
मैंने बंद कर दिया उसे एक मजबूत बक्से में !
लेकिन वह तो फिर भी मर गया ...
नही बचा सका उसे मेरा प्यार .................!!

क्योकि मेरा उस पुष्प से प्यार तो अथाह था किन्तु संवेदना अंशमात्र न थी !!

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किरण श्रीवास्तव मीतू Copyright © 30 nov २०११ रात्रि ९:४०

   पता नहीं कैसे और क्यों हुआ
        पर जो हुआ लगता है अच्छा हुआ
        मुझे तो तुम  से प्यार हुआ
        बस तुम्ही से इकरार हुआ
        यह दिल अब तो तुम्हारे  लिए तरसता है
        तुम्हारी  मुस्कुराहट पर जान छिड़कता है
        तुम्हारी  हर सांस पे जीती हूँ
        तुम्हारी  हर सांस पर ही  मरती हूँ
        लाखों-लाखों बार कहती हूँ
        हाँ, मैं तुमसे प्यार करती हूँ
        रात और दिन तुम्हारा ही इंतज़ार करती हूँ
        दिल की अरमानों का इजहार करती हूँ
        अब कोई दिखता नहीं तुमसे अच्छा
        कोई हो भी तो मैं इनकार करती हूँ
        हर पल नज़र में तुम ही दिखते हो
        तुम्ही हो जिससे मैं प्यार करती हूँ
        तुम्हारी खुशबू बसी है मेरे रूह तक में
        तुम हो बस मेरे ,मैं तेरी स्वीकार करती हूँ
      
         दूर क्यों हो अब आ भी जाओ ना
        मैं तुम्हे बहुत ही याद करती हूँ
        तुम ही बसे हो मेरे रोम रोम में
        यही तो तुझसे फ़रियाद करती हूँ.
        मैं तुम्हे इतना प्यार करती हूँ
        हाँ ,मैं तुमसे प्यार करती हूँ....
        ____________ मीतू !

ख्वाबों में हर पल बसे हैं आप ,
सांसों एहसासों में रमे हैं आप !
नींद से भी जगा जाते हैं आप ,
तन्हाई में भी गुदगुदा जाते हैं आप !!
मेरी रातें आपकी खुशबू से बसी रहती हैं !
लगे आपकी पलकें मुझ पे झुकी रहती हैं !!

अब तो आपके लिए ही जीने को दिल चाहता है !
आपके ही आगोश में खो जाने को दिल चाहता है !!
_____________ मीतू !!

खानाबदोश की तरह जिंदगी ठहरी मेरी...जिस जगह रुक जाऊ बस वही बसेरा...न कोई घर , न मकान , न ही कोई आत्मीय जन ... ठहरती, रूकती , चलती रहती हु मैं...जगह-जगह यादे छोड़ आती हूँ मैं...ले आती हूँ वहाँ की यादे...कभी किसी नदी के किनारे रेत सी बिछ जाती हूँ...तो किसी धरती पर मिट्टी की तरह बिखर जाती हूँ...इस निसंग आकाश में भी तो मेरी आँखों का सूनापन ही दिखता है...क्या पता की मेरे आज का कल क्या होगा...मिल जाउंगी मिट्टी में या गुम हो जाउंगी सितारों में..!

कौन है भला मुझे ढूंढने वाला ? किसको है मेरी प्रतीक्षा ??

_______किरण श्रीवास्तव मीतू Copyright ©

आसमान में बादलो के ढेर की तरह ,
हर रोज़ जमा होते है मेरी पलकों में तुम्हारे सपने ..
तुम से ही गुलजार मेरा प्रांतर ,
जैसे संतुष्ट मन खिला-खिला सा !!

जाने कितना अर्सा हो गया ,
मैंने तुम्हे देखा ही नही ..
लेकिन तुम्हारी वो मीठी सी आवाज़ ..
घोलती रहती है मिश्री मेरे कानो में ..
देती है एहसास तुम्हारे आस-पास ही होने का
और मैं हो उठती हूँ रोमांचित ,
तुम्हारी कल्पना मात्र से ही !!

तुम संग मेरे दिन खिलखिलाहट भरे ,
राते महकी -बहकी सी !

अब फिर कब आओगे ,
अब आ भी जाओ न ...
बर्फीले अंधियारे में , मेरे लिए धुप का उत्ताप लेकर ...
आखिर कब आओगे ?
तमाम यादे, ख्वाहिशे ,ख्वाब
जो की तुम्हे ही लेकर है
मेरी पलकों पर जमा होते जा रहे है !

कैसे बयां करू
कहा न ,
आज मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है !!!!!!.

_____________किरण श्रीवास्तव मीतू Copyright ©
११ सितम्बर २०११ रात्रि ९:४० ..

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एक नन्हा-सा ख्वाब पल रहा है आँखों में ,
कुछ प्यारे -से सपने बुने है मन ने ,
आशाओं की भी लौ टिमटिमा रही है __
तुम आओगे रहोगे जिंदगी में मेरी
पूरा करोगे उस कमी को ,
जो मेरी आसूओ में है ढली !

तुम्हारी प्यारी मुस्कराहट ,
तुम्हारे दिखाए सपने,
देखो सपने ही न रह जाए ...

तुम हकीकत में तो बदलोगे न इसे ??



_____________किरण श्रीवास्तव मीतू Copyright ©

आजकल मैं बेहद नाराज हूँ ,
तुमसे नही खुद से ही !
मुझे सम्हालने का दावा करते -करते ,
देखो तो ,तुमने मुझे किस रास्ते पर ला दिया !
मैं भी तुम्हारे पुरुषार्थ पर यकीन करके ,
आँख मूंदकर तुम्हारे इशारे को ,
अपनी मंजिल समझकर बढती गई ,,,
नही मालूम था की उस कमजोर शरीर में ,
एक कमजोर मन का निवास है ,
जो नही समझ सकता मेरी संवेदनाओं को,
असमर्थ है पूरा करने में अपने दावों को !

आज फिर मैं असहाय -आकुल-व्याकुल -सी ,
बेजान होकर जैसे डूबती जा रही हूँ गहरे जल में ,,,
नही समझ पा रही हूँ कि
इन परिस्थितियों में मैं क्या करूँ ?
अजनबियत से भरे दिन में ,
चिलचिलाती हुई धुप में ,
थक गई हूँ मैं खुद को ही ढ़ोते-ढ़ोते !
अब तो जीने कि इच्छा ही शेष नही ,
लेकिन मुर्दे भी कभी दुबारा मरते है कहीं ???

_____________ मीतू --प्रातः ९:१०

बरसो दुनिया की भीड़ में खोये रहने के बाद
आज ये अनुभूतियाँ कैसी है ?
क्यूँ भोर में भैरवी के साथ ,
दुपहरिया में दरबारी का आनंद लेते
रात का मालकौस गुनगुनाते
खो जाती हूँ ......
सोचने लगती हूँ अपने बारे में ,
हो जाती है फिर से  जीने की लालसा !
क्या होने लगा है मुझे मेरे होने का एहसास ....?

फिर वही तलाश ,
आज फिर छू गई एक अनाम गंध ,
फिर लगा नही रितेगी इसकी ख़ुशबू ,
शायद बने कोई आशियाना .....

पर फिर हंस पड़ी दूनिया ,
बदल गया रुख हवाओं का
तेज़ धूप ने रास्ता और लंबा कर दिया .....

और शुरू हो गई फिर वही तलाश !!!


_______मीतू किरण श्रीवास्तव Copyright ©, 
३०-५-२०११ ---रात्री ११:११

जब- जब धधकी है धर्म की आग ,
मानवता जलकर हो गई ख़ाक !
इंसान के प्रति प्रचंड नफ़रत पालकर ,
उसी ख़ाक पर उड़ाये जाते है विजय-निशान !

_____ meetu १७-७-२०११ रात्रि ९:३५ !!

मैंने कई बार चाहा की
तुमसे कहूँ
मुझे एक शाम सिंदूरी दे दो ......!

मैं थक चुकी हूँ ,
टुकडो में जीते हुए
मुझे एक जिंदगी पूरी दे दो ....!

आँखों में छुपा लू
मन में बसा लू
मेरे मन को स्मृतियों की मयूरी दे दो ...!

है अगर कोई बंधन
तो मुझसे कहो
काट डालू मैं वो बंधन,मुझे सिर्फ मंजूरी दे दो..... !

तुम्हारे पास है
और मैं भटक रही हूँ
तुम मुझे मेरी कस्तूरी दे दो ..!!

___________मीतू !!
११:१५ रात्रि १६-७-२०११

कहने को तो हमसफ़र थे वह ,
और कई राते गुजारी तनहा मैंने ...

बारिश की बूंदों ने ,स्याह तन्हा रातो ने ,
और इस चाँद ने भी -
बार-बार सवाल किया ....
किसके ख़याल में डूबी हुई हो तुम ...

क्या कहूँ तुमसे ,
शिकवा नही फिर भी
दिल पर एक चोट सी लगी ....


_______मीतू Copyright © ३० जून २०११ प्रातः ९:५०

प्रिय,तुम कैसे हो ...
तुम कैसे हो,प्रिय ..
मेरा दिल कतरा-कतरा पिघलता है तुम्हारे लिए ...
तुम्हे भी कुछ ऐसा होता है क्या ?

सो जाता है ये सारा चंचल शहर
मैं तुम्हारी यादो के साए से लिपटी.
करवटे बदलती रहती हूँ सारी - सारी रात...
दरअसल, सिर्फ तुम ही समझ सकते हो ,
की किस तरह से मैं भींगती हूँ मन ही मन में ,
तुम्हारी यादो की बारिश से !

सबको दिखती है इस शहर की रंगीनिया ,
मुझे अब इस निसंग आकाश के अलावा कुछ भी नही दिखता ..
इस अंधड़ , बारिश और मेरे कंधो से लगती हुयी तेज़ हवाओ में ,
अब सिर्फ तुम्हारा ही एहसास है !

जीवन उड़ता ही जा रहा है किसी चपल समुद्री पाखी की तरह,
न मालूम कहाँ , किस ओर ...
अब कोई अलविदा भी नही कहता ,
कोई सर की कसम भी नही देता की वापस लौट आओ !

मैं बिलकुल भी कुशल नही हूँ लेकिन तुम सकुशल रहना,मेरे प्रिय !!

-------------- मीतू Copyright ©, रात्रि ९:४५ २८ मई २०११ !

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इंतहा मुश्किल था ,
किसी को अपने दिल का राज़ बताना ,
उसे अपनी जिंदगी में शामिल करना ,
और अपनी जिंदगी का
राजदार बनाना -
जब हम करीब होते हुए भी दूर थे |

अब हालात यह है कि
हम दूर होते हुए भी दूर है |

फिर सच्चाई तो यही है कि -
नदियों के दो किनारे ,
आपस में कभी मिलते ही नही !
शायद, हमारी किस्मत में
यही लिखा हो कि
हम मिलकर भी नही मिलेंगे कभी |
_________________मीतू Copyright

۩๑๑۩๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩

2:52 PM

कहा था प्रभु ने ,
आउंगा मैं बार-बार ,
जब-जब बढेगा पाप ,
धर्म की होगी हानि !
कहाँ है वह प्रतिज्ञा ?
कहाँ है प्रभु ?
मानव के रूप में ही आज है विद्यमान ,
हिरण्यकश्यप , पूतना , बकासुर , कंस ...

कौन हो कहाँ हो , तुम परिचय दो अपना ,
फिर झूठ ,दंभ स्वार्थ और पाखण्ड का ,
साम्राज्य फैला है ,
आओ तुम एक बार, आओ तुम !!
_______________मीतू !!
१८ फ़रवरी २०११.

पागल हूँ मैं भी ,
कैसे स्वार्थी हो गई मैं अपने लिए ,
जबकि तुम भी जीते हो हर पल ,
मेरे लिए .

पागल हूँ मैं भी ,
जो न समझ पाई ,
सफ़र में हर वक्त तुम्हारा साथ ,
तुम्हारे होने का एहसास ,
फिर भी क्यों समझ बैठी ,
अकेली हूँ मैं ?

पागल हूँ मैं भी ,
मेरा वजूद तुम्हारे वजह से है ,
यह समझने में भी ,
इतने वक्त लगा दिए .

तुमने सच ही कहा ,
मेरे लिए .
सच में ,पागल ही हूँ मैं !!

________मीतू !!

_____________________आत्ममंथन __________________
जाने क्यों आज खुद के ही नाम ख़त लिखने का ख़याल आ गया ! लिखने के लिए कलम उठाई तो गुज़रे हुए जाने कितने लम्हों की यादे सिमट आई ज़ेहन में .....कई हँसते हुए मुकाम भी शामिल हो गए खयालो में , तो चुप-चुप से पलो में घुटती हुयी कई खामोश-सी साँसों की तड़प भी रुला गयी ...... कभी हथेलिओ में चाँद... नज़र आया तो कभी चाहते हुए भी कुछ न कर पाने की कसक होंठो में कैद होकर रह गयी ..... ख्यालो के चिराग जलते रहे और मैं बीती यादो के कोरे पन्नो पर समेटते हुए अपने हिस्से की ज़मीन तलाशने लगी ........"मनचाहा तो किसी को नही मिलता , पर जो मिला . उसका भी मलाल नही है "! वैसे भी अपना वजूद अपनी जमीन तलाशना हर किसी के लिए जरुरी भी तो है ......ताकि बीती हुयी गलतियों को सुधार जा सके , उनसे सीख ली जा सके ..... और अपनी उपलब्धियों से अपनी ख्वाहिशो का आसमान पा सके ......!!
मीतू २०:०९ ...१७०१२०११ ....Copyright ©
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12:15 AM

मैं हूँ एक इंसान !
मेरा व्यक्तित्व कितना महान !!

मैं नित्यानंद भी हूँ,
जो अपनी सेविकावों के साथ अश्लील कार्य करता हूँ !!

मैं इच्छाधारी बाबा भी हूँ जो ,
स्कूली लड़कियों से लेकर एयर -होस्टेस सब को
अपने रैकेट में शामिल कर लेता हूँ !

मैं वो साइबर कैफे भी हूँ ,
जहा स्कूली लड़कियां स्कूल जाने के बहाने आकर अपनी ड्रेस बदल कर ,
अपने बॉय फ्रेंड्स के साथ सारा दिन घूमने के बाद,
फिर से आकर और ड्रेस पहेन कर अपने घर वापस जाती हैं !!

मैं वो शमसान भी हूँ जो गवाह हैं ,
लावारिश लाशो के साथ हुए बलात्कार का !!

मैं वो मंदिर भी हूँ ,
जहा आगे निकलने की होड़ में ,
लोग अपनी मर्यादा लाँघ जाते हैं !!

मैं वो जेल भी हूँ ,
जहाँ यैयाशी के सारे सामान आसानी से उपलब्ध हैं !!

मैं वो T२० की हरी हुई टीम भी हूँ .
जिसे हारने के बाद भी 3 करोड़ मिलते हैं .
पता नहीं ये हारने का इनाम है या
उस देश में जाकर मौज मस्ती करने का !!

मैं वो जनता भी हूँ ,
जो ये जानती है की किये गए वादे झूठे हैं ,
पर फिर भी उसी पार्टी को वोट करती हूँ !!

मैं वो वाहन चालक भी हूँ ,
जो बिना हेलमेट के पकडे जाने पैर .
चालान कटवाने से ज्यदा 50/- देने मैं विस्वास रखता हूँ !!

मैं वो भाई वो पिता वो माँ भी हूँ ,
जो सिर्फ इसलिए अपनी बहिन /बेटी और
दामाद को मार देते हैं की विवाह विजातीय था !!

मैं वो व्यवस्था भी हूँ ,
जहा अच्छे काम करने
वालो का तुरुन्त ट्रान्सफर कर देती हूँ !!

मैं वो लो - वेस्ट जींस भी हूँ ,
जो बाइक पर बैठते ही
अपने अंत: वस्त्रो का प्रदर्शन करती हूँ !!

मैं वो नग्नता भी हूँ ,
जो अब सिनेमा पटल से उतर कर सडको पर चली आई हूँ

मैं वो मूर्ति भी हूँ ,
जिसे एक नेता ने अपने जीवत रहते हुते चौराहे पर लगवा दिया !!

मैं वो औरत भी हूँ
जिसे उसके प्रेमी ने विवाह के बहाने ,
कोठे पर ला कर बेच दिया !!

मैं वो नव -विवाहिता भी हूँ ,
जिसे उसके ससुराल वालो ने
कम दहेज़ लेन के कारन जिन्दा जला दिया !!

मैं वो पुत्र भी हूँ ,
जो जायदाद के लिए
अपने पिता का खून कर देता हूँ !!

मैं वो जल भी हूँ ,
जिसके लिए लोग खून तक कर रहे हैं !!

यह तो एक झलक भर है मेरे व्यक्तित्व का .. फिर भी
मैं हूँ एक इंसान ,
मेरा व्यक्तित्व कितना महान !!

दिनांक २९-६-२०१० .Copyright ©

7:56 PM
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