कितना मुश्किल  है  एहसासों पर  उन्वान लिखना --
जैसे आग पर आग , हवा पर हवा , पानी पर पानी ,
और
तुम्हारे ख्वाबो पर मेरा नाम लिखना !!!



______ मीतू Copyright ©, सायं २० :३० २७ फरवरी २०१२ !

दोस्तों ,
आज शाम लगभग ६:३० पर जब मैं पेट्रोल भरवाने गई, वहाँ सड़क के किनारे कुछ काम चल रहा था , सड़क खुदी पड़ी थी ...कुछ अन्धेरा भी था ... अचानक मेरी गाडी एक छोटे -से ईंट के टुकड़े पर चढ़कर गिरते-गिरते सम्हली .....मैंने गाडी रोकर सोचा की उस ईंट को वहाँ से हटा दू , कही कोई और न गिर कर चोटिल हो जाए !

मैं जैसे ही उस ईंट को उठाने के लिए झुकी , वहाँ मुझे अँधेरे में पड़ा हुआ मोबाइल दिखा , मैंने उसे उठाया , देखा ... फिर पत्थर को एक साइड में फेंक कर अपनी भी गाडी साइड में लगाई .... मोबाइल को फिर से देखा .... मोबाइल अनलाक था .... अहा, क्या खुबसूरत मोबाइल ... थोडा और ध्यान दिया ..अह्हा !!! नोकिया लुमिया !! ग्रेट यार !! ..... मन का शैतान खींसे निपोर कर हंसा -- " क्या गज़ब मेहरबान हुआ है आज ईश्वर मुझ पर , क्या गज़ब फीचर है ,,, क्या फोटो-शोटो है ,,, क्या गाने दिखते है यार ... वाह बेटा मीतु , तेरी तो आज लोटरी लग गई रे .... तेरी तो सब पर रोब जम गई . !''

मैं उस के फीचर-शीचर लगभग १५ मिनट तक देखती रह गई ....... दिल ने कहा '' खरीदने वाले ने जाने कितने शौक से इतना मंहगा मोबाइल खरीदा होगा .....उसे जब पता चलेगा तब कितना परेशान होगा बेचारा .... नही , नही यह गलत होगा !''

मैंने अपनी उस गन्दी सोच को धिक्कारा और सोच लिया की किसी भी तरह इस मोबाइल को उसके मालिक तक पहुचाना ही है ...... कुछ दूर पर ही पुलिस वाले भी खड़े थे किन्तु उन्हें वह मोबाइल देने का दिल नही किया ..... मैंने गाडी में पेट्रोल भरवाया ..... फिर पेट्रोल पम्प से ही उसके स्पेशल कांटेक्ट नंबर जो की स्क्रीन पर ही दिख रहे थे ,उन पर उसी फोन से कॉल किया ..... अपने घर का मैंने एड्रेस बताया और कहा की '' जिस बन्दे का यह फोन हो उन्हें इन्फोर्म करे की वह इस फोन के रसीद के साथ ही आये और अपना फोन ले जाए '' !

करीब आधे घंटे के अन्दर ही एक बंदा अपनी बेटी के साथ ( जो कि करीब २ वर्ष कि रही होगी ) इक डिब्बा काजू-कतली और चोकलेट लेकर आया .... उसने बताया कि वही पर उसकी गाड़ी भी स्लीप हुयी थी .... और पत्नी द्वारा दुसरे नंबर पर फोन आने से पहले तक उसे मालूम ही न था कि उसका फोन गुम भी हो चुका है ..... फिर वह घर गया , रसीद लिया और यहाँ आया !

वह बहुत खुश था ..... उसकी ख़ुशी देखकर मुझे एवं मेरे परिवार को भी बहुत खुश हुयी .... उसकी बच्ची बहुत प्यारी थी , जल्द ही घुल-मिल गई ........ जाते -जाते एक प्यारा -सा रिश्ता भी बना लिया "मीतु-बुआ " ......:) ---- 21 jan 2012

  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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