तुम चले गए तब याद आया....
 

कुछ बातें अभी अधूरी थी ,
कुछ यादें अभी अधूरी थी ,
कुछ वादे थे जो झूठे थे ,
वो जीवन पथ भी सूना था ,
ह्र्दयांगन भी कुछ रीता था ..!
 

कुछ यादें जो तुम छोड़ चले ,
कुछ वादे जो तुम भूल गए ,
हम ठगे ठगे बस खड़े रहे ,
क्या कुछ खोया, क्या कुछ पाया ,
तुम चले गए तब याद आया.

मीतू.....  Copyright ©


हे प्रभु ! कंहा हो तुम ?
कहते हैं सब,
तुम हमारे भीतर हो
तो बतावो ....
पुरुष को कठोर अहंकारी बनाने का अधिकार
दिया किसने तुम्हे ?
क्यों बनाया स्त्री को तुमने कोमल ,निर्मल समर्पिता,?
कहते सुना है स्त्री छलनामयी होती है ,
कैसे ?
छलता तो उसे पुरुष हीं है ,
पिता, पति , पुत्र और प्रेमी बनकर,....
क्या तुमने नहीं छला स्त्री को ?
कोमलांगी , समर्पिता बना कर .....
हे इश्वर मुझसे मिलो
तो पूछूं तुमसे ...
पुरुष को क्यों नहीं दिए ये गुण ?
प्रेम और समर्पण के .......

तुम्हे, मेरा दुसरे मर्दों के साथ,
हँसना और बोलना पसंद नहीं है,-
ये समझकर कि मैं तुम्हारी गैर मौजूदगी में,
आवारा घूमती-फिरती हूँ,
तुम अंदर ही अंदर सुलगते रहते हो......


तुम अपने आपको यंत्रणा देते हो, ये सोचकर-
कि मैं तुम्हारे जानने वालो,
और अपने जानने वालो,
और दुसरे तमाम लोगो के साथ,
तुम्हारे खिलाफ बाते किया करती हूँ.....


तुम्हे इस वहम ने पागल कर रखा है-
कि मैं दूसरे मर्दों के साथ कामुक खेल खेलती होऊंगी ,
महज़ इस ख़याल से -
कि घर वापस आकर तुम्हें न जाने,
किस तरह का मंज़र देखना पड़े ,
तुम्हारे होश गुम हो जाते हैं .......

मेरे साथ रहते हुए, तुम्हारी जिंदगी हजारो -
आशंकाओ में घिरी हुयी हैं,
लेकिन, तुम इतने बुजदिल हो,
कि मेरे बगैर जिंदा भी नहीं रह सकते,
और तुममे इतनी योग्यता भी नही हैं -
कि शादी-शुदा जिन्दगी के योग्य हो सको!!!!!!
मीतू........... Copyright ©

( नोट .... .यह कविता मेरी एक मित्र  के जीवन से ताल्लुक रखती है , जीवन संघर्ष  के दौरान ही वे परिणय सूत्र में बंधे  .... विवाह के ३ वर्ष के अन्दर ही अनामिका घर का सारा कार्य करते हुए  कड़े संघर्ष  के बदौलत नायब तहसीलदार हो गयी किन्तु उसका पति निकम्मा ही रहा ... कई बार उसे व्यवसाय करने के लिए भी पैसा दिया गया ...किन्तु पत्नी की कमाई पर कई व्यवसनो के आदि हो चुके निकम्मे पति को काम करना रास नही आता था ... वह पैसे लेने के लिए आनामिका को उसके कार्य स्थल पर जाकर प्रताड़ित करता था .... बेबुनियाद शक करता था ..और तरह-तरह से मानसिक/शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता था .... यहाँ तक की मेरी उस मित्र के लाख चाहने के बावजूद भी उसने उसको मातृत्व के अधिकार से वंचित रखा था ..तंग आकर मेरी उस मित्र ने आत्महत्या कर ली .!
आज वह पुरुष दो बच्चो का पिता है , पत्नी दूकान चलाती है !!! )

( यह कविता उन शादी-शुदा स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है , जिनके पति हीन भावना के चलते अपनी पत्नियों पर बेबुनियाद शक करते है )

तुम आओं एक बार !
मेरे हृदय का गीला आँगन ,
आतुर है चिन्हित करने को तुम्हारा आगमन...
अनवरत प्रतीक्षा ,
कब तक....?

एक हठीला विश्वास 
तुम्हारे आने का ,
बेबस अकुलाहट में
चू पड़ते हैं आँख से आँसू .........
तुमसे इतना प्यार क्यों.....?

तुम आओं एक बार !
आतुर हैं मेरी भावनाओं के बादल ..
बरसने को तुम पर,
समर्पित मैं तुमको साधिकार !

हर आहट पर तुम्हारे आने का भ्रम,
खुली खिड़की
दो आँखें ,
बस शेष इतना ही .................
.................................
............................................... !!!!

6:29 PM

मेरे ख्वाबों की ज़मीं पर ,
फूटते हैं अंकुर,
नन्ही-नन्ही ,आशाओं के...
जाने कब यह पौधा बनेगा ..
और,
होगा यह पुष्पित-पल्लवित ,
कभी तो मेरे ख्वाब-सच होंगे !!


आ गयी सूने हृदये में कामना को क्या कहें .
तोड़ डाला मौन मेरा , यातना को क्या कहें.

ज़िन्दगी की धार पैनी हो न पाई थी अभी,
क्यों मुझे झकझोर डाला , चेतना को क्या कहें .

तुम न सुन पाओगे पुरवाई की धीमी सिसकियाँ,
रात मीठी याद लाई , भावना को क्या कहें .

लाल सूरज ने कहा , अपना कलेजा थाम के,
लाल धरती हो न पाई साधना को क्या कहें .

पूछती हूँ मौन हैं क्यों आज ये काली घटा ,
बादलो से आ रही संवेदना को क्या कहें .



व्यथित मन के उद्गार प्रश्न जगाते हैं ,
अन्दर ही अन्दर सुसुप्त चेतना को पंख लगाते हैं ....


मन से उड़ गए सारे भाव विचार ,
देखी जब भी सुन्दर सी नार- कचनार ,
पतझड़ के मौसम में भी श्रृंगार होता है ,
हर कन्या को देखते ही दीवाना दिल बार - बार होता है !


ह्रदय में मचती है कुलबुली,
जब घर में आती है कोई चुलबुली ,
तन में उठती है मीठी सिरहन, हों जाता है धन्य तदन !
अरमान भरे दिल को बड़ा दुखाती है ,
जब कन्या कोई अंकल कहकर मुझे बुलाती है ,
मन बड़ा तनावग्रस्त हों जाता है ,
भाव सारा अभावग्रस्त हों जाता है !
फिर भी कोई बात नहीं......
अपनी उच्छृँखलता को अपने गाम्भीर्य के भाव मे बांधकर ,
बेटी कहकर गले लगाता हूँ,
पीठ पर हाथ फेर कर स्वर्ग सुख का आनंद उठाता हूँ !


मैं पुरुष हूँ , पंछी उमुक्त गगन का ,
जिंदगी भर से यही करता आया हूँ ,
अब अधेड़ हों गया तो क्या ?
क्यों रखूं अपनी आकांक्षाओं पर नियंत्रण ?
क्यों मानू खुद को शादी शुदा ?
है नहीं मुझ पर कहीं कोई ठप्पा ?
बालो मे कालिख , चेहरे पर खड़िया ।
मुँह में 32 की जगह 26 दांत हैं ,
उम्र भले ही 55 साल है ,
मगर दिल तो उमंगो से मालामाल है !!


हवाओं में ये कैसी सिहरन,
धरती से उठी कैसी भीनी सुगंध !
फिज़ाओं में ये कैसा जादू ,
मन में उमड़ने लगे है ज़ज्बात !
शुष्क धरती के होठों की प्यास बुझाती,
मौषम की ये पहली बरसात !.........


पहली बारिश के मधुर नाद में,
आर्द्र हों उठा है मन !
हृदय वीणा के मौनबद्ध तार को ,
झनझना देते हैं बार - बार !
हवाएं सरगोशी से कुछ कहने सी लगी है ,

ये कैसा नशा है.... कैसा है ये जादू !.....
क्यों धड़कता दिल, हो रहा है बेकाबू !
सांसे थाम कर बैठे हैं हम ,
ये दिल थामकर बैठे हैं हम!
अब तो कह दो, ..कह दो ...
क्यों हों तुम ऐसे,
कि तुम्हे सजदा करने को बैठे है हम ...!!

इबारत जाग जाती है ,किसी भूली कहानी की !
न देखो इस तरह से ,कांपती है सतह पानी की !!


ज़हन में कौंधती हैं सुबहें , कई धोखे बताती हैं ,
कि बेबुनियाद बातें ,रात भर हमको सताती है !
हमें पहचान लेती है ,ढीठ खुशबु रात रानी की !!


शज़र बूढी दवायों के ,किसे कब शाप देते हैं ,
हम अपना कद पहाड़ों पर,खड़े होकर ही नाप लेते हैं !
कहीं अलफ़ाज़, शीशा, ऋतु कहीं सदा बयानी की !!


उछलते तेज झरनों में,कई खरगोश दिखते हैं ,
घनी परछाईयों में ,हम तुम्ही को धूप लिखते हैं.!
बिखरती है कहाँ तस्वीर , बचपन की , जवानी की !!


एक रिश्ता जो अभी बन रहा था,
टूटने लगा बनने से पहले !
एक सहारे से उठते थे हम,
गिर गए मगर उठने से पहले !
जलाने लगे जो उमीदों के चराग ,
बुझा दिए गए वो जलने से पहले !
कदम जो बढे आपकी दिशा में,
रुक गए वहीँ चलने से पहले !
सीखने लगे थे आपसे मुस्कराना,
रुला दिया हमें हंसने से पहले !
परिभाषा जीवन की खोजने जो निकले,
जिंदगी छिन गयी जीने से पहले !
एक महल बनाया था सपनों की दुनिया में,
गिर गया वो भी नींव रखने से पहले!
क्या यही अर्थ होता है रिश्तों का,
टूटना होता है इनको बनने से पहले!
____________________





1:18 AM

कैसी है ये दुनियां,
कैसे हैं ज़ख्म यहाँ,
कितने हैं दर्द हैं यहाँ,
कितनी पीड़ा, कितनी वेदना,
ख़ुशी से, गम से इसे सहना ही होगा ,
जीवन का यही है पाठ,
इसे तो पढ़ना ही होगा,

मरहम लगाने तो आते हैं कई,
पर दर्द दे जाते हैं वही,
किस पर करेंगे भरोसा,
किस पर करें विश्वाश,
एक थी जो आश ,
उसने भी क्या निराश,
उम्मीद रखी थी जो अपनों से,
अपने भी गैर बन गए,
भला गैर भी कभी अपना बना करते हैं,
मीठा बोलकर वे पीठ में छुरा भोंका करते हैं,
इनमे तो सिर्फ दर्द ही दर्द पला करते हैं,


जरा ये सोच कि वो शख्स किस क़दर था बुलंद ,
जो ज़िन्दगी से कभी हारा नहीं !
बैचैन रहता था विस्तार पाने को ,
उत्सुक रहता था भोर की स्वर्णिम पारदर्शी किरणों की तरह फ़ैल जाने को !
उड़ता रहता था वो पंछी की तरह स्वच्छंद आकाश में ,
रोक नहीं पाता था कोई उसे आत्मसाक्षात्कार से ,
चलते चलते निकल जाता था ,
वो बहुत दूर कहीं ,
जहां कोई किनारा होता नहीं ........
तय करता था वह अपना अनजाना सफ़र ,
केवल खामोश और तनहा ,
बाँध नहीं पाता था कोई ,
सामाजिक बंधनों का बाँध उस पर ..........
नहीं परिसीमन करता था वो उन रिश्तों को ,
जो वो निभा सकता था नहीं .....
जीता था वो तनहा,
करता था वो अपने दिल की !
तभी तो बह नहीं पाया .....
वह वक़्त की बाढ़ में ,
क्यूंकि वह दूर नहीं था
स्वयं से !



तोड़ के बिखेर दे मुझे फ़िज़ाओं में , वक्त के ऐसे तो हालात नही !
करनी है पूरी हर अधूरी तमन्नाएँ , और कोई बात नही !!


परेशाँ है मेरा दिल खुद मुझसे ही, और कोई तो बात नहीं !
किसी नज़्म ने छुआ भर है मुझको, और कोई तो बात नहीं !

कभी टल जाऊं तूफ़ान से ,हरगिज़ मैं वो साहिल भी नहीं !
ज़रा हवा के झोँके बाँहों में ले लूँ,और कोई तो साथ नहीं !

मगरूर नहीं बेबाक हूँ दिल से, पर किसी से कोई एतराज नहीं !
किसी को लगता बुरा तो लगा करे ,मेरा इरादा तो कोई ख़ास नहीं !

जीना चाहूँ आसमान के साथ , अब और कोई तो ख्वाब नहीं !
मुट्ठी में कर लूं माहताब को मै, गुलों का तो कोई हिसाब नही !

क्यूँ पीछे पड़ा है जमाना, मेरा कोई तो गलत बयान नहीं !
किसी को बेवजह रंज दूँ ,मैं ऐसा कोई मेरा अरमान नहीं !

कब निकल जाए वक़्त करीने का, इसका भी अंदाज़ नहीं !
इसीलिए जीती हूँ बिंदास हर पल को,और तो कोई बात नहीं


जब मैंने जन्म लिया ,
तब से ही
मैंने शुरू किया ,
प्रहार झेलना ,
पुरुषों के बनाये हुए नियमों की,
बंदिशों
से मैं लहू लुहान हुई ,
किन्तु मरी नहीं ,
क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ ,........
इसलिए मैं जिन्दा हूँ ,


मैं जिस रास्ते से होकर चलती हूँ.
उस
पर कांटे बिछे हुए हैं ,
मैं अपनी रफ़्तार कितनी भी तेज करुँगी ,
मेरे
अतीत में वे उतने ही ज़ख्म डालेंगे ,


मुझे
मेरी सीमित बातचीत ,
सीमित राह, सीमित इच्छायों ,
और सीमित सपनों के
बारे में ,
सम्यक ज्ञान दिया जायेगा ,


मुझे
मजबूर किया जायेगा ,
दुर्बल, कोमल, भीरु और लाजबन्ती होने के लिए ,
फिर
वो मुझे अबला का नाम देंगे ,


फिर भी
वो मुझे रोक नहीं पाएंगे ,
न ही पूर्ण कर पाएंगे वो अपना नरमेघ यज्ञ ,


क्योंकि


मैं चिरंजीवी हूँ ,
और जब मैं इस दुनियां में आयी थी ,
तभी मैंने
प्रण कर लिया था ,
नहीं पूरी करनी देनी है ,
मुझे मंशा उनकी
और ,
उन्हीं के दायरे में ही मुझे रहकर ,
आगे
और उनसे कहीं आगे बढ़कर दिखाना है ,




तुमको छूने की इक,
तमन्ना हैं दिल में !
रख छोड़ी हैं मैंने एक साँस,
उस मंज़र के लिए !!


अपने दिल के हालात,
कैसे बयां करू ?
पलके झुक जाती हैं,
जब सामने आते हो तुम !!


इक बात तुमसे कहनी हैं,
पर कह नहीं पाते !
दर्द-ए-दिल का इजहार,
हम कर नहीं पाते !!


मगर ऐ लख्ते जिगर,
वो बात कह के जाऊँगी !
तेरे दिल में एक धड़कन,
मैं छोड़ के जाऊँगी !!


आखिरी मोड़ तक करुँगी,
तुम्हारा इंतजार !
अब करे चाहे तू इंकार,
चाहे इकरार !!

3:22 PM


माना,
आपकी बात सही है ,
और आप व्यक्ति भी सही है,
लेकिन
सही बात तो यह है
कि सही बात इस तरह कही नहीं जाती !
पहली बात तो यह
कि सही बात कहने कि
हैसियत भी होनी चाहिए ,
वरना वह बिलकुल गलत बात लगेगी !
फिर समय भी देखना चाहिए,
हर समय सही बात कहने के लिए ,
सही समय नहीं होता !
फिर यह भी तो देखिये
कि कह किससे रहे है,
गलत व्यक्ति से सही बात कहेंगे
तो कैसे निभेंगे ?

तो फिर अपना वक्त देखिये,
और अपना महत्व देखिये,
फिर सामने वाले कि जात देखिये,
और उसकी औकात देखिये ...
सही गलत कि फिक्र
फ़िलहाल रहने दीजिये !!!!
__________किरण श्रीवास्तव "मीतू " !!

एक दिन हंस क्रुद्ध होकर कौवे से बोला ,
घायल प्राणी को सताना है भयंकर पाप ,
कौवा कसाई बनकर तन गया ,
बोला- मांस खाना है हमारा काम -
चाहे जीव जिंदा हो या मुर्दा !!
इतने में बहुत से कौवे इन्सान बन चिल्लाने लगे,
हंस अकेला पड़ा, भाग कर जान बचाई,
नीर छीर विवेक को भूल गया हंस ,
खतरनाक सच्चाई है - जंगल का कानून ,
हत्यारों के देश में हंस नहीं जी सकता है ,
कैसे बदले वो कानून जो बाधक हो उत्थान में ,
 कर रहा है वो संघर्ष यही सच्चाई है ,
हंस और कौवे की यही लड़ाई है.......!!

 

  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
Blogger Templates