7:13 PM


आज की रात बहुत खामोश है ,न चाँद  है न तारा कोई !
हर तरफ अँधेरा ही अँधेरा है
मै बैठी हूँ अकेली छत पर ,

हवाओं  की सरगोशी 
याद दिलाती है तुम्हारी छुअन  का
और मै  रौशन हो जाती हूँ तुम्हारे ख्यालों से !!


११-७-२०१० रात्रि १०:५५

तुम मेरे ज़ेहन में तस्वीर की तरह मत आओ ,
दिल की गहराइयो में उतरता जाता है एक - एक लम्हा !!
तमन्नाये  बनकर  , उमड़  रहा है आँसूवो का तूफान !
कही दूर से आती है आवाज़ ,
यादो के  साये उभरते है ज़ेहन में आहिस्ता - आहिस्ता!!


मचल उठती है तबियत उन सायो को पकड़ने के लिए ,
लेकिन वक्त  मुझे आज से जोड़े रखता है  ,
नयी दुनिया बसाने के लिए !!

चन्द्रवदनी , मृगनयनी , मनमोहिनी!
जब से आई घर में , आँखों में आ गयी रौशनी !!
अपने करकमलो को आराम दिया कर !
बेटी से भी कुछ करवाया कर !!
बड़े बेटे से तू बच के रहना !
मान ले बात मेरी सुनयना !!
न किया कर तू ताक झांक इधर -उधर !
पहनाऊंगा तुझको मै नित नए जेवर !!
क्या कमी है बता मुझमे .!
क्यूँ तके है यूँ दूजे घर में !!
ओ मेरी चन्द्र चकोरी !
मान ले तू बात ये मोरी ...
होठों में लाली लगाकर ,
मुहल्ले में न निकला कर !
यहाँ के छोरे बड़े छिछोरे ,
भर देंगे कान वो तेरे !
कोई तुझे बहकायेगा ,
मेरे घर से उड़ा ले जायेगा !!
तू मेरे आँगन की चिडकुली
जब तू हँसे , हँसे हर फूल कली !!

मै लम्बोदरम् महाकायम् !
उम्र भी मेरी पञ्चदशम् !!
सराबोर मै महकऊवा इत्तर से ,
पहन के आँखों में लालटेन ,
लगाके बालो में कालिख,
करके चेहरे पर चुनाकली ,
ओ मेरी चन्द्रकली ,
मै अभी भी हूँ महाबली !!!!!!!!!!!!!

(मेरे मुहल्ले में एक लगभग ५० वर्षीय विधुर अंकल जी ने जो की ३ जवान बच्चो
के पिता भी है ने अभी २४ वर्षीया कन्या से शादी की है !
और अब वो अपना सारा काम धाम छोड़ कर वो घर में ही रहते है , और बड़े खुश भी रहते है ! आज शाम ....
मै थी अपने छत पर, वो बैठे थे अपने लॉन में
उनको देख कर ये कविता आई मेरे ध्यान में....)

8:07 PM


जीवन में किसी सौभाग्य से कम नहीं,


माँ का होना.....


जिसका ममता भरा हृदय,


जान लेता है वो सब कुछ ...


जो रह जाता है अक्सर अनकहा....


dis iz nt written by me

वो ऊँचाई क्या-


जो मेरे कदमो तले न आये,


वो ख्वाहिश क्या जो इतिहास न बन जाये,


कदम-दर-कदम ज़मीं को नापते रहे हम,


चट्टानों पर चढ़ते चले गये ऊंचाइयों तक पहुँचने कि चाह में,


कुछ ख्वाहिशे, कुछ हौसले, कुछ राहे, साथ थी,


मंजिल थी आँसमां पे,


फिर भी पास थी !!

मै हूँ-

रामायण की सीता,

जिसे निरपराध होते हुए भी प्रत्यक्ष रूप से,

देनी पड़ी थी अग्नि परीक्षा,

स्वर्ण बनने के लिए तपना पड़ा था प्रखर अग्नि में-

अस्तु,

मै द्रोपदी होती तो कर सकती थी,

प्रतीक्षा किसी कृष्ण की,

प्रत्यक्षत: होते चीरहरण को रोकने के लिए..!!

जब मेरे नंगे पाँव,
आग का दरिया पार करते रहे -
मेरे सामने एक नया अध्याय खुला,
मैं, न तो कांच की गुडिया हूँ ,
न मोम की मूरत .....

मैं अमरबेल हूँ !
फुनगी-फुनगी लहरा सकती हूँ,
ज़ख्म-ज़ख्म एहसासों के बाबजूद,
मुस्करा सकती हूँ,
मौत को भी जिन्दगी का,
सबक पढ़ा सकती हूँ !

परिंदा,
पिंजरे के अन्दर,
चारो तरफ गोल-गोल चक्कर लगाया,
उड़ने के लिए पंख फडफडाये-
अफ़सोस
उड़ न सका.....

मै साक्षी थी उसकी बेबसी, लाचारी, क्रोध और झल्लाहट की,
समय के साथ वह
भूलता गया पंख फडफडाना,
समझौता कर लिया था उसने परिस्तिथियों से-
भूल गया ..
वह परिंदा है उन्मुक्त गगन का ..

हम दोनों में एक ही समता थी ...
परिस्तिथियों से सझौता कर लेने की...
और अपने सामर्थ्य को भूल जाने की........!!

माँ ने सिखाया था बचपन में
बेटी जोर से मत हँसना,धीरे ,धीरे बोलना
पूछती थी की - क्यूँ माँ ?
कहती थी, हँसना जब तू अपने घर जाएगी ,
बोलना उससे जिसके संग ब्याहेगी....
मै समझ गयी ,कुछ कहा नहीं ....
आँखों में सपने संजो कर चल दी अपने ससुराल
सोंचा की ,अब खिलखिलायुंगी -
मगर यह क्या ?
यहाँ भी शब्द गूंजते हैं !
और सब कहते हैं !
तू तो परायी है ,अपने घर से क्या लायी है !
माँ ,- बतावो न माँ मेरा घर कहाँ है ?


सड़क किनारे ,
खुले आकाश के नीचे ,
सिसकता है एक नागफनी .
रोज़ मातम मनाता है ,
सिर उठाकर पूंछता है आकाश से ,
मैंने कौन सा पाप किया है ?
जिससे मुझे निकल दिया है ,
फूलों के बाग़ से ,
क्या मैं कुरूप हूँ ?
या मेरे कांटे चुभते हैं सबके दिल में ?
अगर " कांटे " मेरे निर्वासन का कारण हैं ,
तो निकल दो "गुलाब " को भी ,
फूलों के बाग़ से

जिंदगी में एक बार कभी
यह एहसास हों जाता है ,
न चाहते हुए भी अक्सर ,
किसी से प्यार हों जाता है ........!!

फिर हर लम्हा खुशगवार हों जाता है..!
दिल तो पागल ही हो जाता है ,
उनसे जुड़ा हर लम्हा
हर तिनका संजो के रखना चाहता है !!

पर वक़्त की आंधी और किस्मत का तूफां
साहिल से पहले ही
सब कुछ बहा कर ले
जाता है !!


......और किसी अधखिले फूल की तरह ,
पहला प्यार अक्सर अधूरा रह जाता है ..........!!

क्यों होता है जरुरी,
रिश्तो को कोई नाम देना ,,
बेनाम रिश्तो की भी अहमियत है...!
क्योकि !
गहराई में डूबे हुए,
सम्पूर्ण खुबसूरत रिश्ते,,
अक्सर बेनाम ही होते है...!!

गैर को दर्द बताने की,
ज़रूरत क्या है ?
अपने झगडे में ज़माने की,
ज़रूरत क्या है?
ज़िन्दगी वैसे भी कम है,
जीने के लिए !
रूठकर वक़्त गँवाने की,
ज़रूरत क्या है ??

  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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