मैं अब भी इसी आशा में हूँ,
कि तुम कुछ तो कहोगे!
बात आधे रास्ते में छोड़कर,
तुम चुप तो नहीं रहोगे !
मुझे तो अभी बहुत कुछ जानना है,
आकाश का विस्तार नापना है!
सागर की गहराई थाहनी है,
और मरने से पहले खुद
को भी पहचानना है!

जीवन के थपेड़े तो बहुत खाए,
मगर मंसूबे अभी भी मरे नहीं है!
पेड़ के सभी पत्ते गरचे हरे नहीं हैं,
मगर डाली में रस है!
और रस की यह धारा है,
जो कैद से छूटना चाहती है!
टहनी के भीतर
भी अजब सी बेचैनी है,
शायद कोई कोँपल फूटना चाहती है!


कविता एवं फोटोग्राफी ... मीतू !

4 Responses to "कोंपल !"

  1. mrunalinni Says:

    good morning.. SUNDER SANVEDANSHIL PUKAR ZINDAGI KE LIYE. BAHUT ACHCHi kavita KIRAN:)

  2. arvind Says:

    tahani ke bhitar bhi ajab see vaicheni hai...vaah laajavaab.

  3. उपदेश सक्सेना Says:

    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई।
    दस्तूर-ए-दुनिया के निभाती चली गई॥

    चारो तरफ रिवाज़ों की भीड़ है खड़ी,
    रस्में-वफ़ा मैं फिर भी निभाती चली गई।
    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥

    चाहत में तेरी खुद को मिटा डाला है मैंने,
    तेरे लिए हर ग़म को उठाती चली गई।
    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥

    जब भी मेरे दिल ने तुझे याद किया है,
    मैं आँसुओं में खुद को डुबाती चली गई।
    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥

    तेरे बिना यह ज़िन्दगी बेज़ान हुई है,
    हर साँस का मैं बोझ उठाती चली गई।
    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥

    दीवानगी है दिल की यह,दिल्लगी नहीं,
    दीवानगी,जो होश उड़ाती चली गई।
    तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥

  4. sandeep gupat Says:

    ap us jagaha se sochte ho jaha baki sabhi logo ki soch khathma ho jati hai ,bahut sundar ,bahut sahi lagti hai ,thanks

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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