चन्द्रवदनी , मृगनयनी , मनमोहिनी!
जब से आई घर में , आँखों में आ गयी रौशनी !!
अपने करकमलो को आराम दिया कर !
बेटी से भी कुछ करवाया कर !!
बड़े बेटे से तू बच के रहना !
मान ले बात मेरी सुनयना !!
न किया कर तू ताक झांक इधर -उधर !
पहनाऊंगा तुझको मै नित नए जेवर !!
क्या कमी है बता मुझमे .!
क्यूँ तके है यूँ दूजे घर में !!
ओ मेरी चन्द्र चकोरी !
मान ले तू बात ये मोरी ...
होठों में लाली लगाकर ,
मुहल्ले में न निकला कर !
यहाँ के छोरे बड़े छिछोरे ,
भर देंगे कान वो तेरे !
कोई तुझे बहकायेगा ,
मेरे घर से उड़ा ले जायेगा !!
तू मेरे आँगन की चिडकुली
जब तू हँसे , हँसे हर फूल कली !!

मै लम्बोदरम् महाकायम् !
उम्र भी मेरी पञ्चदशम् !!
सराबोर मै महकऊवा इत्तर से ,
पहन के आँखों में लालटेन ,
लगाके बालो में कालिख,
करके चेहरे पर चुनाकली ,
ओ मेरी चन्द्रकली ,
मै अभी भी हूँ महाबली !!!!!!!!!!!!!

(मेरे मुहल्ले में एक लगभग ५० वर्षीय विधुर अंकल जी ने जो की ३ जवान बच्चो
के पिता भी है ने अभी २४ वर्षीया कन्या से शादी की है !
और अब वो अपना सारा काम धाम छोड़ कर वो घर में ही रहते है , और बड़े खुश भी रहते है ! आज शाम ....
मै थी अपने छत पर, वो बैठे थे अपने लॉन में
उनको देख कर ये कविता आई मेरे ध्यान में....)

3 Responses to "विधुर विवाह (व्यंग)"

  1. Navin Says:

    मीतु जी प्रणाम

    पहले तो आपको बधाई की आपने एक ऐसे मुद्दे पे लेख लिखा है जिसपे लिखने के लिये हिम्मत और अंतरात्मा का निर्मल होना जरुरी है । और वो बिल्कुल साफ साफ आपकी इस रचना मे दिखाई दे रहा है ।

    इस निर्मल और सही प्रयास के लिये आपको बधाई ।

    कविता ध्यान मे आपके जरुर आई लेकिन कही आपको उस लडकी वेदना कलम उठाने पे या कम्युटर के की बोर्ड पे अंगुली बिखेरने के लिये मजबुर कर दिया ।

    हो सकता है किसी के लिये यह मजाक होगा या कोई यह कह के निकल जायेगा कि अरे जनाब " दिल तो बच्चा है जी " लेकिन क्या वो उस लडकी की वेदना , कष्ट को महसुस कर सकता है जो पता नही किन परिस्थितियो मे यह बेढंग शादी करने को मजबुर हो गई ।

    बहुत ही खुबसुरती से आपने उस वेदना को अपनी अंगुलियो से उकेरा है और इसके लिये आपको कोटिशः धन्यवाद ।

    शायद आपका यह प्रयास कुछ सकारात्मक बदलाव हमारे समाज मे ले आ सके ।

    धन्यवाद ।

  2. anu Says:

    bahut khoobsoorat....but i kindof agree with Navin...

  3. RAJNISH PARIHAR Says:

    इस निर्मल और सही प्रयास के लिये आपको बधाई ।

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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