जब मैंने जन्म लिया ,
तब से ही
मैंने शुरू किया ,
प्रहार झेलना ,
पुरुषों के बनाये हुए नियमों की,
बंदिशों
से मैं लहू लुहान हुई ,
किन्तु मरी नहीं ,
क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ ,........
इसलिए मैं जिन्दा हूँ ,


मैं जिस रास्ते से होकर चलती हूँ.
उस
पर कांटे बिछे हुए हैं ,
मैं अपनी रफ़्तार कितनी भी तेज करुँगी ,
मेरे
अतीत में वे उतने ही ज़ख्म डालेंगे ,


मुझे
मेरी सीमित बातचीत ,
सीमित राह, सीमित इच्छायों ,
और सीमित सपनों के
बारे में ,
सम्यक ज्ञान दिया जायेगा ,


मुझे
मजबूर किया जायेगा ,
दुर्बल, कोमल, भीरु और लाजबन्ती होने के लिए ,
फिर
वो मुझे अबला का नाम देंगे ,


फिर भी
वो मुझे रोक नहीं पाएंगे ,
न ही पूर्ण कर पाएंगे वो अपना नरमेघ यज्ञ ,


क्योंकि


मैं चिरंजीवी हूँ ,
और जब मैं इस दुनियां में आयी थी ,
तभी मैंने
प्रण कर लिया था ,
नहीं पूरी करनी देनी है ,
मुझे मंशा उनकी
और ,
उन्हीं के दायरे में ही मुझे रहकर ,
आगे
और उनसे कहीं आगे बढ़कर दिखाना है ,


2 Responses to "क्योंकि मैं एक स्त्री हूँ"

  1. Rakesh Kamandal Says:

    Adarniye Meetu Ji
    Aap ke lekh aur kavita par kar lagta to nahi hai ki aap stri hain aap to sakhat Javlamukhi ki tarah hain.

    Sadar.....

  2. परमजीत सिँह बाली Says:

    सुन्दर रचना है ।

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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