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तुम मेरे ज़ेहन में तस्वीर की तरह मत आओ , दिल की गहराइयो में उतरता जाता है एक - एक लम्हा !! तमन्नाये बनकर , उमड़ रहा है आँसूवो का तूफान ! कही दूर से आती है आवाज़ , यादो के साये उभरते है ज़ेहन में आहिस्ता - आहिस्ता!! मचल उठती है तबियत उन सायो को पकड़ने के लिए , लेकिन वक्त मुझे आज से जोड़े रखता है , नयी दुनिया बसाने के लिए !! |
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माँ का होना.....
जिसका ममता भरा हृदय,
जान लेता है वो सब कुछ ...
जो रह जाता है अक्सर अनकहा....
dis iz nt written by me
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जो मेरे कदमो तले न आये,
वो ख्वाहिश क्या जो इतिहास न बन जाये,
कदम-दर-कदम ज़मीं को नापते रहे हम,
चट्टानों पर चढ़ते चले गये ऊंचाइयों तक पहुँचने कि चाह में,
कुछ ख्वाहिशे, कुछ हौसले, कुछ राहे, साथ थी,
मंजिल थी आँसमां पे,
फिर भी पास थी !!
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जब मेरे नंगे पाँव, आग का दरिया पार करते रहे - मेरे सामने एक नया अध्याय खुला, मैं, न तो कांच की गुडिया हूँ , न मोम की मूरत ..... मैं अमरबेल हूँ ! फुनगी-फुनगी लहरा सकती हूँ, ज़ख्म-ज़ख्म एहसासों के बाबजूद, मुस्करा सकती हूँ, मौत को भी जिन्दगी का, सबक पढ़ा सकती हूँ ! |
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परिंदा, पिंजरे के अन्दर, चारो तरफ गोल-गोल चक्कर लगाया, उड़ने के लिए पंख फडफडाये- अफ़सोस उड़ न सका..... मै साक्षी थी उसकी बेबसी, लाचारी, क्रोध और झल्लाहट की, समय के साथ वह भूलता गया पंख फडफडाना, समझौता कर लिया था उसने परिस्तिथियों से- भूल गया .. वह परिंदा है उन्मुक्त गगन का .. हम दोनों में एक ही समता थी ... परिस्तिथियों से सझौता कर लेने की... और अपने सामर्थ्य को भूल जाने की........!! |
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माँ ने सिखाया था बचपन में बेटी जोर से मत हँसना,धीरे ,धीरे बोलना पूछती थी की - क्यूँ माँ ? कहती थी, हँसना जब तू अपने घर जाएगी , बोलना उससे जिसके संग ब्याहेगी.... मै समझ गयी ,कुछ कहा नहीं .... आँखों में सपने संजो कर चल दी अपने ससुराल सोंचा की ,अब खिलखिलायुंगी - मगर यह क्या ? यहाँ भी शब्द गूंजते हैं ! और सब कहते हैं ! तू तो परायी है ,अपने घर से क्या लायी है ! माँ ,- बतावो न माँ मेरा घर कहाँ है ? |
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सड़क किनारे , खुले आकाश के नीचे , सिसकता है एक नागफनी . रोज़ मातम मनाता है , सिर उठाकर पूंछता है आकाश से , मैंने कौन सा पाप किया है ? जिससे मुझे निकल दिया है , फूलों के बाग़ से , क्या मैं कुरूप हूँ ? या मेरे कांटे चुभते हैं सबके दिल में ? अगर " कांटे " मेरे निर्वासन का कारण हैं , तो निकल दो "गुलाब " को भी , फूलों के बाग़ से |
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क्यों होता है जरुरी, रिश्तो को कोई नाम देना ,, बेनाम रिश्तो की भी अहमियत है...! क्योकि ! गहराई में डूबे हुए, सम्पूर्ण खुबसूरत रिश्ते,, अक्सर बेनाम ही होते है...!! |
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गैर को दर्द बताने की, ज़रूरत क्या है ? अपने झगडे में ज़माने की, ज़रूरत क्या है? ज़िन्दगी वैसे भी कम है, जीने के लिए ! रूठकर वक़्त गँवाने की, ज़रूरत क्या है ?? |
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