मुझे प्यार था एक पुष्प  से ,
इतना प्यार की ,
मुझे डर होने लगा कि-
कहीं प्रजिन के तेज़ झोंको से बिखर न जाए उसकी मासूम पंखुड़ियाँ ...
कहीं धुप की प्रखर किरणे झुलसा न दे उसको ..
कहीं कोई पडोसी तोड़  न ले जाए उसको चुपके से ....!
यह सब ख्याल करके ,
की अब रहे सुरक्षित वह...
मैंने बंद कर दिया उसे एक मजबूत बक्से में !
लेकिन वह तो फिर भी मर गया ...
नही बचा सका उसे मेरा प्यार .................!!

क्योकि मेरा उस पुष्प से प्यार तो अथाह था किन्तु संवेदना अंशमात्र न थी !!

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किरण श्रीवास्तव मीतू Copyright © 30 nov २०११ रात्रि ९:४०

9 Responses to "संवेदना !!"

  1. Dinesh Dard Says:

    किरण जी ! इस कविता सहित आपकी अनेक कविताएँ पढ़ीं.......पढ़कर लगा के सचमुच इन विषयों को इन्हीं संवेदनाओं, शब्दों और अभिव्यक्ति की तलाश थी......जो रचनाओं की शक्ल में पूरी हुई...........मुबारक़बाद और शुभकामनाएं. - दिनेश "दर्द"

  2. चैतन्य शर्मा Says:

    बहुत सुंदर ..प्यारी कविता

  3. Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार Says:






    आदरणीया किरण श्रीवास्तव मीतू जी
    सस्नेहाभिवादन !

    मेरा उस पौधे से प्यार तो अथाह था किन्तु संवेदना अंशमात्र न थी !!
    बहुत ही भावप्रवण रचना है …
    संवेदना बिना प्यार निरर्थक है …

    सुंदर रचना के लिए साधुवाद !


    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

  4. sansadvani Says:

    all the best kiran ji.....

  5. sansadvani Says:

    all the best kiran ji..............

  6. ROMESH shukla Says:

    bad aks
    bura mai ho meri parchai nhi kubsurat tum hari kvita hai gustaq adaye hai kamsil ko samjhaye kai se
    aks tu kisi ki tarif bhi khul kar nhi kar sakta logo ko bura lag jye gaa
    bura lagne se aks ko koi taklif nhi lekin burai hogi naam tumhara leke
    hame to kahte he hai lo bad aks?>

  7. amrendra "amar" Says:

    bahut pyari rachna

  8. bhavesh8553 Says:

    Bahot hi sundar aur atulniy hai apki kavitaye

  9. Pramod Says:

    all your compositions are very beautiful but some are too much dramaticised i wud say... good blog anyway!!

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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