आजकल मैं बेहद नाराज हूँ ,
तुमसे नही खुद से ही !
मुझे सम्हालने का दावा करते -करते ,
देखो तो ,तुमने मुझे किस रास्ते पर ला दिया !
मैं भी तुम्हारे पुरुषार्थ पर यकीन करके ,
आँख मूंदकर तुम्हारे इशारे को ,
अपनी मंजिल समझकर बढती गई ,,,
नही मालूम था की उस कमजोर शरीर में ,
एक कमजोर मन का निवास है ,
जो नही समझ सकता मेरी संवेदनाओं को,
असमर्थ है पूरा करने में अपने दावों को !

आज फिर मैं असहाय -आकुल-व्याकुल -सी ,
बेजान होकर जैसे डूबती जा रही हूँ गहरे जल में ,,,
नही समझ पा रही हूँ कि
इन परिस्थितियों में मैं क्या करूँ ?
अजनबियत से भरे दिन में ,
चिलचिलाती हुई धुप में ,
थक गई हूँ मैं खुद को ही ढ़ोते-ढ़ोते !
अब तो जीने कि इच्छा ही शेष नही ,
लेकिन मुर्दे भी कभी दुबारा मरते है कहीं ???

_____________ मीतू --प्रातः ९:१०

10 Responses to "खंडित आत्मा !"

  1. किरण श्रीवास्तव "मीतू" Says:

    शायद तुम्हे एहसास भी न हुआ होगा ,
    कितने दंश मिले है मुझे तुम्हारी खामोशी से ...
    तुम तो हंस के टाल गए ,
    लेकिन मैं अब भी वही रुकी पड़ी हूँ ,
    ठिठकी -सी !!
    ___ मीतू !!

  2. किरण श्रीवास्तव "मीतू" Says:

    कभी-कभी खुद पर रोना आता है ....
    मन विचलित हो जाता है ,,
    नही समझ पाते है की हम कहा आ गए ,
    क्या यही चाह थी जो हम तुमसे पाए ??
    _____ मीतू !

  3. किरण श्रीवास्तव "मीतू" Says:

    दरअसल मैं ही नही समझ पा रही हूँ ,
    जिंदगी की इस पहेली को सुलझाऊ कैसे ??
    टूटे हुए किरचो को बटोरते हुए ,
    हाथो को लहू-लुहान होने से बचाऊं कैसे ??
    _________ मीतू .!

  4. किरण श्रीवास्तव "मीतू" Says:

    एक जर्जर आत्मा,
    बिखरा आस्तित्व ,
    फूटा भाग्य ,
    थके हुए शरीर के साथ ,
    कैसे भागू मैं ,
    इन विपरीत परिस्थितियों से ..!
    सामना करने की ताकत भी नही
    पूरे धरती पर छुपने की कोई जगह भी नही !!
    _________ मीतू !

  5. S.N SHUKLA Says:

    बहुत सुन्दर रचना , बहुत खूबसूरत प्रस्तुति आभार

  6. Atul Shrivastava Says:

    सुंदर भावाभिव्‍यक्ति....


    अच्‍छी प्रस्‍तुति....


    शुभकामनाएं आपको..............

  7. vattsala pandey Says:

    मुझे आपका ब्लॉग और रचनाएँ दोनों ही पसंद आए.
    आपसे एक प्रश्न भी है मेरा कि आपने प्रेम का कैसा रूप देखा है? आपने खुद को कितना प्रेम किया है ?
    आपके पास गहरी संवेदना है उसे और पकने दो .
    अपने प्रेम को ऐसा विस्तार दो कि वह अनन्य हो जाय.

  8. naresh Says:

    bahut sundar meetu g.apke lekhan me kuch alag hi kashish h.god bless u.

  9. Kaushal Srivastav Says:

    aapke sabdo ne kafi pravawit kiya....
    apki rachana apni si lagi.
    achank hi apke blog se aaj rubru ho gaya.
    anandit kar diya apne.
    keep ur pen on............

  10. shivs Says:

    किरन जी आपकी रचना मे एक कशीश है जो बार बार देखने को उद्वेलित करता है. धन्यवाद.

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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