कहा था प्रभु ने ,
आउंगा मैं बार-बार ,
जब-जब बढेगा पाप ,
धर्म की होगी हानि !
कहाँ है वह प्रतिज्ञा ?
कहाँ है प्रभु ?
मानव के रूप में ही आज है विद्यमान ,
हिरण्यकश्यप , पूतना , बकासुर , कंस ...

कौन हो कहाँ हो , तुम परिचय दो अपना ,
फिर झूठ ,दंभ स्वार्थ और पाखण्ड का ,
साम्राज्य फैला है ,
आओ तुम एक बार, आओ तुम !!
_______________मीतू !!
१८ फ़रवरी २०११.

4 Responses to "आओ तुम !!"

  1. Sanjay Says:

    यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
    (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४)




    भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।

  2. Sanjay Says:

    जब ईश्वर के बारे में निश्चित धारणा ही न बन सकी हो तो श्रीकृष्ण के ईश्वरावतार होने-न-होने के बारे में भला क्या कहा जा सकता है ? ऐसी स्थिति में “मैं युग-युग में जन्म लेता हूं ।” कथन कितना सार्थक कहा जाऐगा ? लेकिन मान लेता हूं कि महाभारत का युद्ध हुआ था, उसमें भगवदावतार श्रीकृष्ण की गंभीर भूमिका थी, और उन्होंने अपने हथियार डालने को उद्यत अर्जुन को ‘धर्मयुद्ध’ लड़ने को पे्ररित किया । उन्होंने युद्धक्षेत्र में जो कुछ कहा क्या वह अर्जुन को युद्धार्थ प्रेरित करने भर के लिए था या उसके आगे वह एक सत्य का प्रतिपादन भी था ? दूसरे शब्दों में, उपर्युक्त दोनों श्लोकों में जो कहा गया है वह श्रीकृष्ण का वास्तविक मंतव्य था, या वह उस विशेष अवसर पर अर्जुन को भ्रमित रखने के उद्येश्य से था । जब मैं गंभीरता से चिंतन करता हूं तो मुझे यही लगता है कि ईश्वर धर्म की स्थापना के लिए पुनः-पुनः जन्म नहीं लेता है ! कैसे ? बताता हूं ।

    मान्यता है कि महाभारत का युद्ध द्वापर युग के अंत में हुआ था । उसी के बाद कलियुग का आरंभ हुआ । चारों युगों में इसी युग को सर्वाधिक पाप का युग बताया जाता है । सद्व्यवहार एवं पुण्य का लोप होना इस युग की खासियत मानी जाती है । कहा जाता है पापकर्म की पराकाष्ठा के बाद फिर काल उल्टा खेल खेलेगा और युग परिवर्तन होगा । मैं बता नहीं सकता हूं कि कलियुग के पूर्ववर्ती सैकड़ों-हजारों वर्षों तक स्थिति कितनी शोचनीय थी, धर्म का ह्रास किस गति से हो रहा था, किंतु अपने जीवन में जो मैंने अनुभव किया है वह अवश्य ही निराशाप्रद रहा है । समाज में चारित्रिक पतन लगातार देखता आया हूं । देखता हूं कि लोग अधिकाधिक स्वार्थी होते जा रहे हैं और निजी स्वतंत्रता के नाम पर मर्यादाएं भंग करने में नहीं हिचक रहे हैं । सदाचरण वैयक्तिक कमजोरी के तौर पर देखा जाने लगा है । बहुत कुछ और भी हो रहा है ।

    इस दशा में मेरे मन में प्रश्न उठता है कि श्रीकृष्ण के उपर्युक्त कथनों के अनुसार तो उन्हें धर्म की स्थापना करने में सफल होना चाहिए था, तदनुसार अपने पीछे उन्हें एक धर्मनिष्ठ समाज छोड़ जाना चाहिए था । लेकिन हुआ तो इसका उल्टा ही । महाभारत की युद्धोपरांत कथा है कि कौरव-पांडवों का ही विनाश नहीं हुआ, अपितु श्रीकृष्ण के अपने वृष्णिवंशीय यादवों का भी नाश हुआ । ‘सामर्थ्यवान्’ श्रीकृष्ण स्थिति को संभालने में असमर्थ सिद्ध हुए थे । अंत में निराश होकर उन्होंने अपने दायित्व अर्जुन को सौंप दिए और अग्रज बलभद्र के साथ वन में तपस्वी का जीवन बिताने चले गये । वहीं एक व्याध के हाथों उनकी मृत्यु हुई थी ।

  3. deveshacharya Says:

    ahasas karo ishwar tumhare pas hai , andar hai bahar hai. aatm tatw se dooriya hi to bhatakaaw hai.

  4. shashwat kumar Says:

    hi, mitu gee ...... eswar hamase se aap ke paas hai....aap use pahchan nahi rahe hain......jab v aap dil se yad kar to wah aap ki madad ke lia taiyar milte hain....phir v use aap nahi pahchan pa rahe hain......prataik avtar me wah ek nayi rup rekha aur naye tarike ke sath aate hain. bas ham sab use pahchan nahi pate hain.....use aap ki jayada khayal hai islia wah aap ke aaspas hi rahta hai bas use aap dil se yad karain...................love is life & love is god.........smile please......

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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