बरसो दुनिया की भीड़ में खोये रहने के बाद
आज ये अनुभूतियाँ कैसी है ?
क्यूँ भोर में भैरवी के साथ ,
दुपहरिया में दरबारी का आनंद लेते
रात का मालकौस गुनगुनाते
खो जाती हूँ ......
सोचने लगती हूँ अपने बारे में ,
हो जाती है फिर से  जीने की लालसा !
क्या होने लगा है मुझे मेरे होने का एहसास ....?

फिर वही तलाश ,
आज फिर छू गई एक अनाम गंध ,
फिर लगा नही रितेगी इसकी ख़ुशबू ,
शायद बने कोई आशियाना .....

पर फिर हंस पड़ी दूनिया ,
बदल गया रुख हवाओं का
तेज़ धूप ने रास्ता और लंबा कर दिया .....

और शुरू हो गई फिर वही तलाश !!!


_______मीतू किरण श्रीवास्तव Copyright ©, 
३०-५-२०११ ---रात्री ११:११

9 Responses to "फिर वही तलाश !!"

  1. Shashwat Shekhar Says:

    मुझको मेरे होने का अहसास. बेहतरीन कविता. भाव निखर कर सामने आ गए.

  2. S.N SHUKLA Says:

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति , आभार

  3. राजीव थेपड़ा Says:

    bas ek shabd....."vaah" mitu ji...

  4. राजीव थेपड़ा Says:

    khud ke baare men aapke kahe gaye koteshan lajawaab hain....agar aap aisi hi ho....to vaakayi ye acchha hai......

  5. Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार Says:

    .



    आदरणीया मीतू किरण श्रीवास्तव जी
    सादर अभिवादन !

    बहुत सुंदर लिखती हैं आप …
    भोर में भैरवी के साथ ,
    दुपहरिया में दरबारी का आनंद लेते
    रात का मालकौस गुनगुनाते
    खो जाती हूं ......

    आहाऽऽह !

    आपके भावों-शब्दों में आपका संगीत-ज्ञान भी मुखरित हुआ है …


    काफी देर से आपके ब्लॉग पर हूं … कई रचनाएं पढ़ीं … आपकी लेखनी की प्रशंसा में पर्याप्त शब्द नहीं हैं मेरे पास … साधु !

    समय निकाल कर मेरे यहाम भी पधारें … स्वागत है !

    मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

  6. ๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, Says:

    waah man prasan ho gaya sundar kavita bhavon ko jis prakar aapne shadon main piroya hai wo jitna kahain kam hai..

  7. swapneshchauhan Says:

    बहुत बढिया कविता...

  8. a k mishra Says:

    बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना...किरण जी..अभिव्यक्तिपरक एवं अतिशय मर्मस्पशी कविता...मन में उठते द्वंद्व ,दिल को तड़पाता दर्द ,यादों के साये,वर्तमान का एहसास और भविष्य की चिंता ..इनसब अनुभूतियों की समष्टि है आपकी इस भावमयी शब्दों की अल्पना में.. निराशा के बीच आशा की मुस्कुराहटें और फिर अचानक टूटता विश्वास ,लेकिन अंततः आती हैं जीवनपथ पर बढ़ते कदमों की आवाजें...आशा निराशा के भंवर में डूबती उतराती जीवनपथ को उद्घाटित करती आपकी यह शब्द-सरिता आखिकार लक्ष्य की ओर बढ़ जाती है..
    चल रहे थे जिस डगर पर
    न जाने कैसे डगर बदला
    बढ़ रहे थे किस दिशा में
    रास्ते ने क्यों रुख है बदला
    दो पल के हसीं सपनों में ही
    हवाओं ने अपना रुख बदला
    जिंदगी में होती है कभी ऐसी भी बात
    लेकिन फिर भी चलते रहते हैं पतवार
    चट्टानों की बाधाओं के बीच भी
    रुकती नहीं सरिताओं के प्रवाह..

  9. sunil singh Says:

    itani shuddh hindi,itna sundar rachna man prashann ho gaya

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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