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मन है की बस पांखी की तरह , उड़ता ही जा रहा है अतीत की गलियों में , कभी सुनहरे बादलो के बीच तो कभी तितलियों के देश .... मन के सिन्धु है की छलकने को तैयार , नैनों के तटबंध तोड़ विद्रोह करने को आतुर , क्या कहू , कैसे .. किससे ? अब तो कुछ भी पता नही , अपना भी नही .... थक चुके है पर , ढूंढ़ रहे है छाँव भरे मुंडेर ..... नही कोई आसरा , है हर तरफ कड़ी धूप , माँ के आँचल की छाँव , पिता के बाहों का सहारा , ओंझल हुआ सब महत्वकांक्षाओ के आकाश में !! नही-नही , अब कुछ भी तो नही ! मै भी नही , कुछ नही अब कोई नही ....! बस यूँ ही .... |
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अर्थ है क्या- प्रेम का , आकांक्षा का ...तुम बताओ ! क्या इसे हम प्राप्त करते है निरर्थक आस्था में , या की सरिता के निराले बांकपन में ? --तुम बताओ ! शांत लहरों की अज़ब उत्तेजना का सबब क्या है ? सिन्धु जल के ज्वार में क्या राज़ है ? --मुझको बताओ ! रूठ जायेंगे , न मानेंगे युगों तक ! तुम कहाँ हो , कौन हो ? कुछ तो बताओ ....!!!!!!!! |
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. विभावरी की द्वितीय बेला में , मेरे मित्र से मेरा साक्षात्कार हुआ ! कहने लगा सो जाओ तुम , मत उलझो इन जंजालों में ..... क्या पाओगी तुम , क्या तुमने खोया है ? कैसे सुनेगा कोई बात तुम्हारी , जब सारा जग सोया है !! जानता हूँ तुम हो अकेली , इस जीवन के कुरुक्षेत्र में ! पर कैसे दू साथ तुम्हारा , लगा दे न कोई कलंक हममे !! सीख सको तो सीख लो इतिहास , जब अभिमन्यु हारा था ! चुन-चुन कर अपनों ने ही , उसे रण-भूमि में मारा था !! विचार संकीर्ण , कुंठित मानसिकता , आज फिर अभिमन्यु अकेला है ! मत सोचो , अब सो जाओ सखी.. यह रात्रि की चतुर्थ बेला है...... (यह कविता मेरे मित्र से मेरी बातचीत का सारांश है, इसमें कुछ लाइन बिना बदलाव के है ..) |
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आज फिर झंझा घिरी और मन के सिन्धु छलके !
ये कौन आया याद कि ये नयनो के तटबंध छलके !!
दूर तक घन तिमिर के श्याम अंचल में ,
एक आभा बिम्ब की सी आती हलचल में ,
और मेरी रागिनी व्यग्र होती ,
उसे पाने उर्मि झिलमिल में ....
बिम्ब वो क्यू पास आते , मेहमां थे चंद पल के !
ये कौन आया याद कि ये नयनो के तटबंध छलके !!
----मीतू ०६०९२०१० सायं ८:०३ Copyright ©
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