नही जानती , तुम्हारी बातो में तिलिस्म है या जादू ..
फिर भी , तुम्हारी हर बात पर एतबार है मुझे !!

नही जानती , कितनी तपिश है तुम्हारे होंठो में ..

फिर भी , उन्हें छूने की कसक है मुझे !!

नही जानती , तुम्हारी आँखे आईना है या समुंदर..

फिर भी , उनमे डूबने की ख्वाहिश है मुझे !!

नही जानती , तुम्हारे साथ से मुझे क्या मिलना और क्या  खोना है ..

फिर भी , उस अनुभव को पाने की तड़प है मुझे !!

नही जानती , तुम्हारा बहाव मुझे किस और ले जाएगा ..

फिर भी तुममे तिरोहित हो जाने का शौक है मुझे !!

नही जानती , तुम मेरा साथ दोगे या नही ..

फिर भी तुम्हारे लिए बगावत का हौसला है मुझे !!!!

____ किरण श्रीवास्तव Copyright © २८/९/२०१२ -- सायं  ७:२६ !!

5 Responses to "नही जानती !!"

  1. Rajesh Kumari Says:

    खूबसूरत जज्बात भरी प्रस्तुति

  2. a k mishra Says:

    वाह...बहुत ही सुन्दर कविता...किरण जी अतिशय भावपूर्ण और अतिशय मधुर ...आप तो शब्द-शिल्पी हैं...आपकी लेखिनी से निःसृत एक-एक शब्द दिल की आवाज बनकर बोल रहा है....जादू है इन शब्दों में...श्रृंगार रस में डूबी प्रेम की अद्भुद अभिव्यक्ति है आपकी रचना...अपने प्रिय के प्रति समर्पित एक नायिका के दिल के कोमल भावों की मनोरम उद्भूति ...पर मन में कुछ उहापोह और कसमकस भी है जिसे बड़े ही सुन्दर ढंग से उपालंभ के रूप में आपने वर्णित किया है.अच्छी बात यह है कि उहापोह और उपालंभ के बीच भी हमेशा आशावादिता है और अपने प्रिय से सकरात्मक प्रतिदान की अपेक्षा है...अपने प्रिय के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार मन अपने प्रिय से भी उसी तरह की प्रेम की आशा कर रहा है.कविता भावप्रधान है जो दिल के जज्वात को उजागर करती है..भावों के माधुर्य में जगह-जगह अतिशय विह्वलता है जो किसी के भी ह्रदय को व्याकुल कर सकती है....बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्तिपरक रचना...कोमल किशलयवत शब्दों एवं मधुर सुवासयुक्त पुष्पवत भावों से सुसज्जित है आपकी यह संवेदनात्मक काव्य-वल्लरी ...
    अतिशय मनमोहक एवं मुग्धकारी और बिलकुल ही भावमयी ...
    क्या कहूँ...शब्दों के लालित्य और भावों के सौन्दर्य से परिपूर्ण आपकी इस रचना-लता की सुरभि से पूरा काव्य-उपवन ही महक उठा है...संवेदना से संश्लिष्ट आपकी यह कविता दिल के कोमल तंतुओं को स्पंदित कर रही है ..भावनाओं की सीप से निकले असली मोती के सामान है आपकी यह रचना..
    लेखन की अद्भुद जादूगरी है कि
    बह जाती है संवेदना की सरिता
    भावना आपके शब्दों में ढलकर
    बन जाती है मधुर-सी कविता !!
    मैं क्या कहूँ,बस इतना कहूँगा....
    किसी की याद जब दिल में समाया हो
    उसकी चाहत ने हर पल सहलाया हो
    मन मचलता है पास आने को
    जिंदगी साथ -साथ निभाने को
    आँखों में सपना है तो होगा जरूर साकार
    प्रिय की ओर से भी मिलेगा आपको प्यार !!
    इति शुभं !!

  3. rudra shrivastava Says:

    mragmarichika ki tarah bhagati jeewan ke pal kuchh paane ki chahat, kuchh khone ke jajbat, har pal ek naya ahasas samay ki gati ke sath visamrat hota huaa yado ka karvan kya yahi jindagi.

  4. Islamic Research Point Says:

    !

    khubsurat soch hai aur kubsura andaz hai apni soch ko shabdik roop dene ki,,really i liked yr poetry but jab mai is pankti ko pdha to mere mann me ik sawal utha socha aap se jaroor bantni chahiye,,,
    नही जानती , तुम्हारी आँखे आईना है या समुंदर..
    फिर भी , उनमे डूबने की ख्वाहिश है मुझे !

    first line me poet ko ye pata nahi hai k ankhe ayina hai ya samandar phir second line me dubne ki kiun bat ki jarahi hai, ayine me to duba nahi jatasakta,aur jab poet dubne ki bat karta hai to iska matlab wo pahle se hi samander samajh raha hai ankho ko,,,,,?????

  5. rajesh Says:

    bahut badiya kavita likhti hai aapke vicharon se prabhavit hu me

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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