चल न पाए कभी इस दुनिया के बाज़ार में ,
लोग कहते है की सिक्के खोटे है हम ...
कहने वाले तो कहते है हमें घमंडी भी ,
पर रातो में अक्सर रोते है हम ....
जो भी मिलता है उसे बना लेते है अपना ,
फिर अपनों को ही खोते है हम ....
टूटती है रोज़ आशा की कोई "किरण"...
फिर एक नई उम्मीद के बीज बोते है हम !!
___________________________

______ किरण मीतू Copyright ©
१०-११-२०११---२१:३०

13 Responses to "खोटे सिक्के !!"

  1. vinay ke shabd Says:

    per doosre is peeda ko nahi samajhte .

  2. vinay ke shabd Says:

    pataa nahi kyon in ek-ek letter dil ko andar tak apna lag rahaa hai ....

  3. vinay ke shabd Says:

    pataa nahi kyon in ek-ek letter dil ko andar tak apna lag rahaa hai ....

  4. Bahar Says:

    I m surprising that u know very good urdu poetry.

  5. Bahar Says:

    I m surprising that how do u know Urdu poetry...Is it ur own poetry..

  6. sunny Says:

    it's feel a realty some where

  7. sawan Says:

    Dear Kiran, May God Bless you.

    My best compliments and regards to you.

    I am impressed with your writing, thoughts, poetry and views on columns, stories and news has the favour of your comments, you shared with us.

    thanks for sharing all these...

  8. bablu Says:

    मै किरन जी का आभारी हू , जिनके कारण मै यहाँ तक पहुच पाया , किरन जी आपका धन्यवाद .............

  9. Raj Says:

    aapka ak ak sbd dil chu lany vala h.lgta h jasy lekh tum rhi ho laken aavaj mary dil ke ho. i like very very much.

  10. बचपन Says:

    आपका अंदाज बेहद पसंद आया। ये शब्दों के प्रति आपका लगाव यूं ही कायम रहे दुआ है मेरी....
    मनोज पुरोहित अनंत

  11. ANIRUDDHA GHOSH Says:

    AAPKI KUCH SHAYERI PADH KE MUJHE AISA LAGA DARD KO APNE EK JIVAN KA PRATIBIMBH BANA LIYA HAI ,PATA NAI KYU AISA LAGA , I MAY BE WRONG EK CHOTA SA NIVEDAN THA AAPSE "LOG MAEUS RHA KARTE HAI JAB UMEED BIKHAR JATE HAI, DIL PE CHOT PAUCHTA HAI, AUR DUSRO KO KHUSH DEKHTE HAI SAME SITUTION MEI, PAR SOCHTE YEH NAHI KI UMEED JO USKA NAI HO SAKA 2SRO KI V NAI HO SAKE GA/I"

  12. anil Says:

    यूं तो हर किसी का फ़साना होता है
    कोई अपना कोई बेगाना होता है
    नदिया मिले जब सागर से तो ही
    कोई दीवाना होता है

    मीतू जी …………
    Really achha likhti ho....!

  13. Atul Shrivastava Says:

    बेहतरीन रचना।

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  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
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