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चल न पाए कभी इस दुनिया के बाज़ार में , लोग कहते है की सिक्के खोटे है हम ... कहने वाले तो कहते है हमें घमंडी भी , पर रातो में अक्सर रोते है हम .... जो भी मिलता है उसे बना लेते है अपना , फिर अपनों को ही खोते है हम .... टूटती है रोज़ आशा की कोई "किरण"... फिर एक नई उम्मीद के बीज बोते है हम !! ___________________________ ______ किरण मीतू Copyright © १०-११-२०११---२१:३० |
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