मैंने कई बार चाहा की
तुमसे कहूँ
मुझे एक शाम सिंदूरी दे दो ......!

मैं थक चुकी हूँ ,
टुकडो में जीते हुए
मुझे एक जिंदगी पूरी दे दो ....!

आँखों में छुपा लू
मन में बसा लू
मेरे मन को स्मृतियों की मयूरी दे दो ...!

है अगर कोई बंधन
तो मुझसे कहो
काट डालू मैं वो बंधन,मुझे सिर्फ मंजूरी दे दो..... !

तुम्हारे पास है
और मैं भटक रही हूँ
तुम मुझे मेरी कस्तूरी दे दो ..!!

___________मीतू !!
११:१५ रात्रि १६-७-२०११

10:44 PM
6:52 PM

कहने को तो हमसफ़र थे वह ,
और कई राते गुजारी तनहा मैंने ...

बारिश की बूंदों ने ,स्याह तन्हा रातो ने ,
और इस चाँद ने भी -
बार-बार सवाल किया ....
किसके ख़याल में डूबी हुई हो तुम ...

क्या कहूँ तुमसे ,
शिकवा नही फिर भी
दिल पर एक चोट सी लगी ....


_______मीतू Copyright © ३० जून २०११ प्रातः ९:५०

7:51 AM

प्रिय,तुम कैसे हो ...
तुम कैसे हो,प्रिय ..
मेरा दिल कतरा-कतरा पिघलता है तुम्हारे लिए ...
तुम्हे भी कुछ ऐसा होता है क्या ?

सो जाता है ये सारा चंचल शहर
मैं तुम्हारी यादो के साए से लिपटी.
करवटे बदलती रहती हूँ सारी - सारी रात...
दरअसल, सिर्फ तुम ही समझ सकते हो ,
की किस तरह से मैं भींगती हूँ मन ही मन में ,
तुम्हारी यादो की बारिश से !

सबको दिखती है इस शहर की रंगीनिया ,
मुझे अब इस निसंग आकाश के अलावा कुछ भी नही दिखता ..
इस अंधड़ , बारिश और मेरे कंधो से लगती हुयी तेज़ हवाओ में ,
अब सिर्फ तुम्हारा ही एहसास है !

जीवन उड़ता ही जा रहा है किसी चपल समुद्री पाखी की तरह,
न मालूम कहाँ , किस ओर ...
अब कोई अलविदा भी नही कहता ,
कोई सर की कसम भी नही देता की वापस लौट आओ !

मैं बिलकुल भी कुशल नही हूँ लेकिन तुम सकुशल रहना,मेरे प्रिय !!

-------------- मीतू Copyright ©, रात्रि ९:४५ २८ मई २०११ !

۩๑๑۩๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩


इंतहा मुश्किल था ,
किसी को अपने दिल का राज़ बताना ,
उसे अपनी जिंदगी में शामिल करना ,
और अपनी जिंदगी का
राजदार बनाना -
जब हम करीब होते हुए भी दूर थे |

अब हालात यह है कि
हम दूर होते हुए भी दूर है |

फिर सच्चाई तो यही है कि -
नदियों के दो किनारे ,
आपस में कभी मिलते ही नही !
शायद, हमारी किस्मत में
यही लिखा हो कि
हम मिलकर भी नही मिलेंगे कभी |
_________________मीतू Copyright

۩๑๑۩๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩๑๑๑۩

10:17 PM
3:01 PM
2:52 PM

कहा था प्रभु ने ,
आउंगा मैं बार-बार ,
जब-जब बढेगा पाप ,
धर्म की होगी हानि !
कहाँ है वह प्रतिज्ञा ?
कहाँ है प्रभु ?
मानव के रूप में ही आज है विद्यमान ,
हिरण्यकश्यप , पूतना , बकासुर , कंस ...

कौन हो कहाँ हो , तुम परिचय दो अपना ,
फिर झूठ ,दंभ स्वार्थ और पाखण्ड का ,
साम्राज्य फैला है ,
आओ तुम एक बार, आओ तुम !!
_______________मीतू !!
१८ फ़रवरी २०११.

पागल हूँ मैं भी ,
कैसे स्वार्थी हो गई मैं अपने लिए ,
जबकि तुम भी जीते हो हर पल ,
मेरे लिए .

पागल हूँ मैं भी ,
जो न समझ पाई ,
सफ़र में हर वक्त तुम्हारा साथ ,
तुम्हारे होने का एहसास ,
फिर भी क्यों समझ बैठी ,
अकेली हूँ मैं ?

पागल हूँ मैं भी ,
मेरा वजूद तुम्हारे वजह से है ,
यह समझने में भी ,
इतने वक्त लगा दिए .

तुमने सच ही कहा ,
मेरे लिए .
सच में ,पागल ही हूँ मैं !!

________मीतू !!

_____________________आत्ममंथन __________________
जाने क्यों आज खुद के ही नाम ख़त लिखने का ख़याल आ गया ! लिखने के लिए कलम उठाई तो गुज़रे हुए जाने कितने लम्हों की यादे सिमट आई ज़ेहन में .....कई हँसते हुए मुकाम भी शामिल हो गए खयालो में , तो चुप-चुप से पलो में घुटती हुयी कई खामोश-सी साँसों की तड़प भी रुला गयी ...... कभी हथेलिओ में चाँद... नज़र आया तो कभी चाहते हुए भी कुछ न कर पाने की कसक होंठो में कैद होकर रह गयी ..... ख्यालो के चिराग जलते रहे और मैं बीती यादो के कोरे पन्नो पर समेटते हुए अपने हिस्से की ज़मीन तलाशने लगी ........"मनचाहा तो किसी को नही मिलता , पर जो मिला . उसका भी मलाल नही है "! वैसे भी अपना वजूद अपनी जमीन तलाशना हर किसी के लिए जरुरी भी तो है ......ताकि बीती हुयी गलतियों को सुधार जा सके , उनसे सीख ली जा सके ..... और अपनी उपलब्धियों से अपनी ख्वाहिशो का आसमान पा सके ......!!
मीतू २०:०९ ...१७०१२०११ ....Copyright ©
०००००००००●●●▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬●●●००००००००००

12:15 AM

मैं हूँ एक इंसान !
मेरा व्यक्तित्व कितना महान !!

मैं नित्यानंद भी हूँ,
जो अपनी सेविकावों के साथ अश्लील कार्य करता हूँ !!

मैं इच्छाधारी बाबा भी हूँ जो ,
स्कूली लड़कियों से लेकर एयर -होस्टेस सब को
अपने रैकेट में शामिल कर लेता हूँ !

मैं वो साइबर कैफे भी हूँ ,
जहा स्कूली लड़कियां स्कूल जाने के बहाने आकर अपनी ड्रेस बदल कर ,
अपने बॉय फ्रेंड्स के साथ सारा दिन घूमने के बाद,
फिर से आकर और ड्रेस पहेन कर अपने घर वापस जाती हैं !!

मैं वो शमसान भी हूँ जो गवाह हैं ,
लावारिश लाशो के साथ हुए बलात्कार का !!

मैं वो मंदिर भी हूँ ,
जहा आगे निकलने की होड़ में ,
लोग अपनी मर्यादा लाँघ जाते हैं !!

मैं वो जेल भी हूँ ,
जहाँ यैयाशी के सारे सामान आसानी से उपलब्ध हैं !!

मैं वो T२० की हरी हुई टीम भी हूँ .
जिसे हारने के बाद भी 3 करोड़ मिलते हैं .
पता नहीं ये हारने का इनाम है या
उस देश में जाकर मौज मस्ती करने का !!

मैं वो जनता भी हूँ ,
जो ये जानती है की किये गए वादे झूठे हैं ,
पर फिर भी उसी पार्टी को वोट करती हूँ !!

मैं वो वाहन चालक भी हूँ ,
जो बिना हेलमेट के पकडे जाने पैर .
चालान कटवाने से ज्यदा 50/- देने मैं विस्वास रखता हूँ !!

मैं वो भाई वो पिता वो माँ भी हूँ ,
जो सिर्फ इसलिए अपनी बहिन /बेटी और
दामाद को मार देते हैं की विवाह विजातीय था !!

मैं वो व्यवस्था भी हूँ ,
जहा अच्छे काम करने
वालो का तुरुन्त ट्रान्सफर कर देती हूँ !!

मैं वो लो - वेस्ट जींस भी हूँ ,
जो बाइक पर बैठते ही
अपने अंत: वस्त्रो का प्रदर्शन करती हूँ !!

मैं वो नग्नता भी हूँ ,
जो अब सिनेमा पटल से उतर कर सडको पर चली आई हूँ

मैं वो मूर्ति भी हूँ ,
जिसे एक नेता ने अपने जीवत रहते हुते चौराहे पर लगवा दिया !!

मैं वो औरत भी हूँ
जिसे उसके प्रेमी ने विवाह के बहाने ,
कोठे पर ला कर बेच दिया !!

मैं वो नव -विवाहिता भी हूँ ,
जिसे उसके ससुराल वालो ने
कम दहेज़ लेन के कारन जिन्दा जला दिया !!

मैं वो पुत्र भी हूँ ,
जो जायदाद के लिए
अपने पिता का खून कर देता हूँ !!

मैं वो जल भी हूँ ,
जिसके लिए लोग खून तक कर रहे हैं !!

यह तो एक झलक भर है मेरे व्यक्तित्व का .. फिर भी
मैं हूँ एक इंसान ,
मेरा व्यक्तित्व कितना महान !!

दिनांक २९-६-२०१० .Copyright ©

7:56 PM
10:21 PM

अजीब सच है यह 'माँ' ,
की आपके पास न रहने पर ,
कुछ ज्यादा ही महसूस किया है आपको !
कबसे ज़ज्ब हूँ मै आपमें , पता ही न चला...
बस एक ही पहेली है ,
क्या मेरे भाव पहुचते भी है आप तक ???

(आज बरबस ही माँ याद आ गई,ये पंक्तियाँ माँ को समर्पित!)

10:08 PM

जब हम होते हैं खुद से
निराश और बोझिल ,
जब कोई नही दिखता है आस-पास ,
जब खो जाता
हैं आत्मविश्वास ,
जब उठने लगता है ईश्वर पर से भी विश्वास ...
तभी
अचानक एक दोस्त आता हैं ज़िन्दगी में . कही से --
शायद सात समुन्दर
पार से ,
शायद कही आस-पास से ,
बनके शम्भू , बनके तारणहार ,
और
दिलाता है विश्वास --
जब कोई न हो तुम्हारे साथ...
तुम्हारे साथ -"मै हूँ न "

(मित्र को सादर समर्पित)

शायद यह भी दोस्त का एक रूप होता है ,
जब चाहते है उसे अपने नजदीक ,
तभी वह दूर होता है !

कभी बहाना समय का ,
कभी बहाना विचारो का ,
तो कभी बीमारी का ,
खुद में उलझना रिश्तो को बचाते हुए !
जब जरुरत हो छाँव की तभी वह धूप होता है !

फिर भी वह हमें अज़ीज़ है बहुत !
क्युकी वह हमारा ही प्रतिरूप होता हैं !!

( अपने एक अज़ीज़ मित्र को समर्पित )

8:47 PM
1:21 AM

किसे कहूँ दोस्त ? तुम्हे , उनको या खुद को .
उलझन ही रही सब कुछ ,
शायद जिन्दगी .शायद तुम .शायद मै .....

किसे समझू --
तुम्हे या खुद को ?
किसे पढू --
तुम्हे या खुद को ?
शायद नादान हूँ मै....
रहने दो न नादान मुझे
क्या होगा पहचान कर हर चेहरों को ?
हर चेहरे में आईना ही तो दिखता है ...
जाना-पहचाना सा.
क्या कोई रिश्ता फांसी के फंदे से कम होता है ?
दम घुटते हुए रोज़ मरते है हम इन्ही रिश्तो में .
फिर भी रिश्तो को हलकी सी ठेस में तोड़ कर ,
आगे बढ़ जाते है नए रिश्तो की तलाश में ...
जाने दो , मत बताओ मुझे --रिश्तो का दर्शन ....
बहुत चुभे है ये टूटे हुए कांच के किरचो की तरह ........
नही नही अब नही , कुछ नही !
बस यूँ हीं !


कविता एवं फोटोग्राफी --मीतू .
दिनांक ०४१०२०१० रात्रि ११:२५ .


10:17 PM

मैं अब भी इसी आशा में हूँ,
कि तुम कुछ तो कहोगे!
बात आधे रास्ते में छोड़कर,
तुम चुप तो नहीं रहोगे !
मुझे तो अभी बहुत कुछ जानना है,
आकाश का विस्तार नापना है!
सागर की गहराई थाहनी है,
और मरने से पहले खुद
को भी पहचानना है!

जीवन के थपेड़े तो बहुत खाए,
मगर मंसूबे अभी भी मरे नहीं है!
पेड़ के सभी पत्ते गरचे हरे नहीं हैं,
मगर डाली में रस है!
और रस की यह धारा है,
जो कैद से छूटना चाहती है!
टहनी के भीतर
भी अजब सी बेचैनी है,
शायद कोई कोँपल फूटना चाहती है!


कविता एवं फोटोग्राफी ... मीतू !

तुमको छूने की ख्वाहिश थी ,

मगर तुम दूर थे आफताब की तरह !


ये देख लो मेरे हौसलों की उड़ान ,


पकड़ किया अपने हाथो में गुलो की तरह !!


कविता  २६ ०९ २०१० अपरान्ह ३:००

चले जाओ ,
मै अब नही रोकूंगी तुम्हे ,
जाना ही चाहते हो न ,
जाओ ,
किसने तुम्हे रोका है..
पर जाने से पहले ,एक बात समझ लो--

जिन्दगी मे फिर कभी
मुडकर ना देखना,
जिसे तुम छोड़ कर चले गए ,वो जिन्दा है की मर गयी
इसके बारे में भी बिलकुल भी मत सोचना .
उसका सुकून उससे कोसो दूर हो ,
तुम अपनी जिन्दगी सुकून से जीना .
उसे नींद आये ना आये ,
तुम सुन्दर सपनो की नींद सोना !
तुम्हारे साथ जमाना चलेगा गुनगुनाता ,
लेकिन उसकी तनहाइयों को तुम ना सोचना !
तुम दोस्ती करना वादियों की खूबसूरती से ,
उसे अपने टूटे हुए सपनो के साथ छोड़ देना !
तुम सबके के प्यारे बन जाओ ,
वो सिर्फ तुम्हारे प्यार भरी की एक नजर के लिए तडपेगी ..
जाना ही चाहते हो न ,
चले जाओ ,किसने तुम्हे रोका है... !!
मीतू ....Copyright ©

12:14 AM

मन है की बस पांखी की तरह ,
उड़ता ही जा रहा है अतीत की गलियों में ,
कभी सुनहरे बादलो के बीच तो कभी तितलियों के देश ....
मन के सिन्धु है की छलकने को तैयार ,
नैनों के तटबंध तोड़ विद्रोह करने को आतुर ,

क्या कहू , कैसे .. किससे ?
अब तो कुछ भी पता नही  ,
अपना भी नही ....
थक चुके है पर , ढूंढ़ रहे है छाँव भरे मुंडेर .....
नही कोई आसरा ,
है हर तरफ कड़ी धूप ,
माँ के आँचल की छाँव ,
पिता के बाहों का सहारा ,
ओंझल हुआ सब महत्वकांक्षाओ के आकाश में !!
नही-नही ,
अब कुछ भी तो नही !
 मै भी नही ,
कुछ नही
अब कोई नही ....!
बस यूँ ही ....

अनजाने में हुई एक छोटी सी बेवकूफी पाप बन जाती है ,
जिसका धुल पाना सातो ज़न्म में भी मुश्किल हो जाता है !
कभी-कभी अनजाने में लगी एक छोटी सी चोट नासूर बन जाती है ,
जिसका निस्तारण सिर्फ चिता के साथ ही होता है !!



5:21 AM

काला जादू काली रात ,उल्लू से उल्लू की बात ...!
जादू से तूझे बना के कबूतर , कर दू पराधीन तुझे पिंजरे के अन्दर !
कपटी तेरी माया विकराल , मारूंगी तुझको तिकड़म की घात....!
पड़ा नही अभी तू मेरे पाले,कर दूंगी तुझको निष्प्राण ..!!
.११ रात्रि २८-०८-२०१०

   

अब क्या बताएं , हमने क्या-क्या देखा ,
ज़माने के डर से दोस्त को भाई बनते देखा !
कुत्तो के डर से शेर को राह बदलते देखा ,
शाश्वत सत्य को अदना झूठ से हारते देखा !
...भरी दुपहरियां में सूरज को ढ़लते देखा !!!
अब क्या बताएं हमने क्या-क्या देखा ...
(०३०९२०१० प्रातः १०:००)



नेहिया लगाला पिया,माना मोरी बतिया राम
कसकेला करेजवा में तोहरी सुरतिया राम !!

माघ महिनवा में सरसों फुलाला ,
हमार झुराई गईले प्रीत के बिरवा राम !

तोहके पुकारेला पागल मनवा ,
सुधियों न लेहला पिया ,भेजला नहीं पतिया राम !

तडपत बीत गईल सारी जिन्द्गनियाँ !
बिरहिनी गिने तारा,सारी सारी रतियाँ राम !!

मैंने औरत को पिटते देखा है ,
और बादलो को भी घिरते देखा है ,
लेकिन आकाश में नही, उस औरत की आँखों में !


मैंने पानी फिरते देखा है, उसके सपनो में !
जब वे चूर-चूर होकर कसकते है उसकी आँखों से ,
तब उसका जिस्म ही नही टूटता ,
टूटता है उसका विश्वास भी रिश्तो से !
टूटता है उसका आत्मबल भी,उसके ही अपनों से !


मैंने हारते देखा है, मनोबल को शारीरिक बल से !
जब औरत पिटती है,अपने पति के हाथों से !
मैंने उन्ही हाथो से ,
उस औरत को असुरक्षित देखा है ,
जिनका दावा है उसके संरक्षकत्व का !


और चुपके से दुआ मांगते भी देखा है ,
उसी औरत को- उसके लिए ,
जिससे - बाराहा पिटती है वह,
सुबह शाम और रातो को ....!!


(यह कविता आँखों-देखी पर आधारित है !
कालोनी में अक्सर देखती थी ...
एक दिन पूछा भी उनसे - "भाभी, क्यूँ सहती हो" ?
लेकिन उनके जवाब में फिर भी पति के प्रति आदर और सम्मान ही पाया....


पत्नी अध्यापिका और पति इंजिनियर-और उनके घर में यह हाल !
...क्या यही है स्थिति हमारी ?)

.

 
अर्थ है क्या- प्रेम का , आकांक्षा का ...तुम बताओ !
क्या इसे हम प्राप्त करते है निरर्थक आस्था में ,
या की सरिता के निराले बांकपन में ?
--तुम बताओ !

शांत लहरों की अज़ब उत्तेजना का सबब क्या है ?
सिन्धु जल के ज्वार में क्या राज़ है ?
--मुझको बताओ !

रूठ जायेंगे , न मानेंगे युगों तक !
तुम कहाँ हो , कौन हो ?
कुछ तो बताओ ....!!!!!!!!

.
विभावरी की द्वितीय बेला में ,
मेरे मित्र से मेरा साक्षात्कार हुआ !
कहने लगा सो जाओ तुम ,
मत उलझो इन जंजालों में .....

क्या पाओगी तुम ,
क्या तुमने खोया है ?
कैसे सुनेगा कोई बात तुम्हारी ,
जब सारा जग सोया है !!

जानता हूँ तुम हो अकेली ,
इस जीवन के कुरुक्षेत्र में !
पर कैसे दू साथ तुम्हारा ,
लगा दे न कोई कलंक हममे !!

सीख सको तो सीख लो इतिहास ,
जब अभिमन्यु हारा था !
चुन-चुन कर अपनों ने ही ,
उसे रण-भूमि में मारा था !!

विचार संकीर्ण , कुंठित मानसिकता ,
आज फिर अभिमन्यु अकेला है !
मत सोचो , अब सो जाओ सखी..
यह रात्रि की चतुर्थ बेला है...... 



(यह कविता मेरे मित्र से मेरी बातचीत का सारांश है,
इसमें कुछ लाइन बिना बदलाव के है ..)

                                              

4:20 AM


‎ आज फिर झंझा घिरी और मन के सिन्धु छलके !

ये कौन आया याद कि ये नयनो के तटबंध छलके !! 

दूर तक घन तिमिर के श्याम अंचल में ,

एक आभा बिम्ब की सी आती हलचल में ,

और मेरी रागिनी व्यग्र होती ,

उसे पाने उर्मि झिलमिल में ....

बिम्ब वो क्यू पास आते , मेहमां थे चंद पल के !

ये कौन आया याद कि ये नयनो के तटबंध छलके !!


----मीतू ०६०९२०१० सायं ८:०३ Copyright ©

  • संवेदना

    क्यों लिखती हूँ नहीं जानती, पर लिखती हूँ... क्योकि महसूस करना चाहती हूँ प्रेम-पीड़ा-परिचय-पहचान! तन्हाई में जब आत्म मंथन करती हूँ तो व्यक्तिगत अनुभूतियाँ, अनुभव मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर कविता का रूप ले लेती है!! ---किरण श्रीवास्तव "मीतू" !!

    अपने दायरे !!

    अपने दायरे !!
    कुछ वीरानियो के सिलसिले आये इस कदर की जो मेरा अज़ीज़ था ..... आज वही मुझसे दूर है ..... तल्ख़ हुए रिश्तो में ओढ़ ली है अब मैंने तन्हाइयां !! ......... किरण "मीतू" !!

    स्पंदन !!

    स्पंदन !!
    निष्ठुर हूँ , निश्चल हूँ मैं पर मृत नही हूँ ... प्राण हैं मुझमे ... अभी उठना है दौड़ना हैं मुझे ... अपाहिज आत्मा के सहारे ... जीना है एक जीवन ... जिसमे मरण हैं एक बार ... सिर्फ एक बार !! ..... किरण " मीतू" !!

    सतरंगी दुनिया !!

    सतरंगी दुनिया !!
    आस-पास , हास-परिहास , मैं रही फिर भी उदास ...आत्मा पर पड़ा उधार , उतारने का हुआ प्रयास ... खुश करने के और रहने के असफल रहे है सब प्रयास !! ..... किरण "मीतू" !!

    उलझन !!

    उलझन !!
    अकेले है इस जहां में , कहाँ जाए किधर जाए ! नही कोई जगह ऐसी की दिल के ज़ख्म भर जाए !! ... किरण "मीतू" !

    तलाश स्वयं की !!

    तलाश स्वयं की !!
    कुछ क्षण अंतर्मन में तूफ़ान उत्पन्न कर देते है और शब्दों में आकार पाने पर ही शांत होते है ! ..... मीतू !!

    ज़ज़्बात दिल के !

    ज़ज़्बात दिल के !
    मंजिल की तलाश में भागती इस महानगर के अनजानी राहो में मुझे मेरी कविता थाम लेती है , मुझे कुछ पल ठहर जी लेने का एहसास देती है ! मेरी कविता का जन्म ह्रदय की घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही होता है !! ..... किरण "मीतू" !!

    मेरे एहसास !!

    मेरे एहसास !!
    मेरे भीतर हो रहा है अंकुरण , उबल रहा है कुछ जो , निकल आना चाहता है बाहर , फोड़कर धरती का सीना , तैयार रहो तुम सब ..... मेरा विस्फोट कभी भी , तहस - नहस कर सकता है , तुम्हारे दमन के - नापाक इरादों को ---- किरण "मीतू" !!

    आर्तनाद !

    आर्तनाद !
    कभी-कभी जी करता है की भाग जाऊं मैं , इस खुबसूरत ,रंगीन , चंचल शहर से !! दो उदास आँखे .....निहारती रहती है बंद कमरे की उदास छत को ! . ..लेकिन भागुंगी भी कहाँ ? कौन है भला , जो इस सुन्दर सी पृथ्वी पर करता होगा मेरी प्रतीक्षा ? ..... किरण "मीतू" !!

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !

    मेरा बचपन - दुनिया परियो की !
    प्रकृति की गोद में बिताये बचपन की मधुर स्मृतियाँ बार-बार मन को उसी ओर ले जाती है ! मानव जीवन में होने वाली हर बात मुझे प्रकृति से जुडी नज़र आती है तथा मैं मानव जीवन तथा प्रकृति में समीकरण बनाने का प्रयास करती हूँ !....किरण "मीतू

    कविता-मेरी संवेदना !!

    कविता-मेरी संवेदना !!
    वेदना की माटी से , पीड़ा के पानी से , संवेदनाओ की हवा से , आँसूवो के झरनों से ! कोमल मन को जब लगती है चोट , निकलता है कोई गीत , और बनती है कोई कविता !! ..... मीतू !!
Blogger Templates